Spread the love

संपादकीय

पानी प्रकृति की देन है, फिर प्यास की कीमत क्यों?

उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, जंगल और नदियों से नहीं है। यह वह प्रदेश है जहां से गंगा-यमुना जैसी महान नदियों की धाराएं निकलती हैं और हजारों जलस्रोत पहाड़ की जीवनरेखा बनते हैं। ऐसे राज्य में जब घर की नल की टोंटी से पानी आता है तो उसके साथ एक सवाल भी आता है—जिस पानी को प्रकृति ने दिया, उसकी कीमत क्यों?

इस सवाल का जवाब यह है कि सरकार आम तौर पर पानी के प्राकृतिक स्रोत के लिए नहीं, बल्कि उसे शुद्ध करने, पंप करने, पाइपलाइन बिछाने, बिजली, कर्मचारियों, मरम्मत और घर तक पहुंचाने वाली व्यवस्था के लिए शुल्क लेती है। यह तर्क अपनी जगह उचित है। आखिर जलापूर्ति की व्यवस्था चलाने के लिए संसाधन चाहिए।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब जलापूर्ति की लागत और पानी की कीमत के बीच का अंतर धुंधला हो जाता है।

पानी कोई सामान्य बाजारू वस्तु नहीं है। भोजन, कपड़े या दूसरी उपभोक्ता वस्तुओं की तरह पानी का विकल्प नहीं है। इंसान पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकता। इसलिए जल शुल्क की व्यवस्था बनाते समय सबसे पहले यह देखना होगा कि किसी परिवार की आर्थिक स्थिति उसके पानी के अधिकार में बाधा न बने।

उत्तराखंड के संदर्भ में यह प्रश्न और गंभीर है। पहाड़ का गांव अक्सर जलस्रोत के आसपास बसा है। ग्रामीण महिलाएं और परिवार दशकों से प्राकृतिक स्रोतों, धारों और गाड़-गदेरों पर निर्भर रहे हैं। दूसरी तरफ कई शहरों में बढ़ती आबादी और निर्माण ने प्राकृतिक जलस्रोतों पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में सरकार यदि पानी के लिए शुल्क लेती है तो नागरिक यह जानने का अधिकार भी रखते हैं कि उस शुल्क का कितना हिस्सा जलस्रोतों के संरक्षण, पुनर्जीवन और स्थानीय जल व्यवस्था पर खर्च हो रहा है।

क्यों न जल शुल्क की व्यवस्था में यह सिद्धांत स्पष्ट हो कि पानी मुफ्त हो सकता है, लेकिन पानी पहुंचाने की सेवा का उचित शुल्क लिया जा सकता है? और उस शुल्क में भी गरीब परिवारों, ग्रामीण क्षेत्रों तथा कम खपत वाले उपभोक्ताओं को राहत मिले।

इसके साथ एक और सवाल जरूरी है—क्या जितना पानी कोई परिवार इस्तेमाल करता है, उसी अनुपात में शुल्क हो? अत्यधिक खपत करने वाले उपभोक्ता से अधिक और न्यूनतम जीवन-जरूरत भर पानी लेने वाले परिवार से कम शुल्क लिया जा सकता है। इससे जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।

उत्तराखंड को एक ऐसी जल नीति की जरूरत है जिसमें जल स्रोत को आर्थिक संपत्ति से पहले सार्वजनिक प्राकृतिक धरोहर माना जाए। नदियां और जलस्रोत केवल राजस्व का माध्यम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की पूंजी हैं।

जिस पहाड़ ने देश के बड़े हिस्से को पानी दिया, वहां के लोगों को अपने ही प्राकृतिक संसाधन के लिए असहाय उपभोक्ता नहीं बनाया जा सकता। सरकार का दायित्व केवल बिल भेजना नहीं, बल्कि स्रोत बचाना, पानी उपलब्ध कराना और उसकी कीमत गरीब की पहुंच में रखना भी है।

इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि पानी पर शुल्क हो या नहीं। असली सवाल है—

शुल्क किस बात का हो, कितना हो, किससे लिया जाए और उससे मिलने वाला पैसा कहां खर्च हो?

क्योंकि पानी प्रकृति की देन है; नागरिक को जो भुगतान करना चाहिए, वह पानी की प्यास का नहीं, उसे सुरक्षित और समान रूप से घर तक पहुंचाने की व्यवस्था का होना चाहिए।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *