संपादकीय | बिजली कनेक्शन महंगा, सुविधा कितनी आसान?
उत्तराखंड में बिजली का नया कनेक्शन लेना अब उपभोक्ताओं की जेब पर पहले से अधिक बोझ डालने वाला है। 1 नवंबर से प्रस्तावित नई व्यवस्था में सर्विस लाइन चार्ज बढ़ाकर 1 किलोवाट तक के सामान्य कनेक्शन के लिए ₹1,400, 4 से 10 किलोवाट तक ₹3,000 और 10 से 25 किलोवाट तक ₹5,000 किया गया है। दूसरी ओर, नई व्यवस्था में कनेक्शन प्रक्रिया को सरल बनाने, व्यक्तिगत साइट निरीक्षण और इस्टीमेट की जरूरत खत्म करने का दावा किया गया है।
सवाल शुल्क बढ़ने भर का नहीं है, बल्कि बिजली जैसी बुनियादी सुविधा तक पहुंच की लागत का है। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां बड़ी संख्या में छोटे कारोबारी, ग्रामीण परिवार, स्वरोजगार करने वाले युवा और छोटे उद्यम बिजली कनेक्शन पर निर्भर हैं, वहां शुरुआती शुल्क में बढ़ोतरी को केवल प्रशासनिक बदलाव मानकर नहीं देखा जा सकता।
यह जरूर सकारात्मक है कि प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने की कोशिश की जा रही है। यदि उपभोक्ता को कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें, साइट निरीक्षण और अनावश्यक अनुमान की प्रक्रिया खत्म हो तथा निर्धारित शुल्क के बाद कनेक्शन समयबद्ध तरीके से मिल जाए, तो यह सुधार स्वागत योग्य होगा।
लेकिन सरल प्रक्रिया का अर्थ महंगी प्रक्रिया नहीं होना चाहिए। नियामक व्यवस्था का मूल उद्देश्य उपभोक्ता और विद्युत वितरण व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना है। इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि बढ़ा हुआ सर्विस लाइन शुल्क वास्तविक लागत पर आधारित है या इसमें उपभोक्ताओं पर ऐसा अतिरिक्त भार डाला जा रहा है जिसे वितरण कंपनियों को स्वयं वहन करना चाहिए।
प्रीपेड मीटर लेने वालों से सिक्योरिटी न लेने का प्रावधान राहत देने वाला है। फिर भी छोटे घरेलू उपभोक्ताओं और छोटे उद्यमियों के लिए शुल्क का पुनर्मूल्यांकन जरूरी है।
उत्तराखंड को आज नए बिजली कनेक्शन महंगे करने से ज्यादा बिजली की पहुंच आसान, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की जरूरत है। पहाड़ में स्वरोजगार और छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने की बात तभी जमीन पर उतरेगी, जब बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाएं नए उद्यमी के लिए बाधा नहीं, सहारा बनें।
बिजली कनेक्शन की प्रक्रिया सरल हो—लेकिन उसकी कीमत आम उपभोक्ता की पहुंच के भीतर भी रहे, यही नियामक व्यवस्था की असली कसौटी होनी चाहिए।
