दया नहीं, सुगम अवसर चाहिए—क्योंकि प्रतिभा को सबसे ज्यादा जरूरत रास्ते की होती है

समाज अक्सर दिव्यांग व्यक्ति को उसकी कठिनाइयों से पहचानता है। हम देखते हैं कि वह चल सकता है या नहीं, लिख सकता है या नहीं, बोल सकता है या नहीं। लेकिन बहुत कम बार हम यह सवाल पूछते हैं कि क्या हमारी व्यवस्था उसे अपनी क्षमता दिखाने का अवसर दे रही है?
दिल्ली की विनायना खुराना की कहानी इसी सोच को चुनौती देती है।
Cerebral Palsy के साथ जन्मीं विनायना के लिए बचपन में चलना, बैठना और पेन पकड़कर लिखना भी आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को अपनी पूरी पहचान नहीं बनने दिया। तकनीक और सुगम माध्यमों के सहारे उन्होंने अभिव्यक्ति के रास्ते खोजे और लेखन, कविता तथा कहानी कहने को अपनी ताकत बनाया। आज वह दिल्ली विश्वविद्यालय के Non-Collegiate Women’s Education Board में English Literature की Guest Lecturer हैं और लेखिका, कवयित्री तथा दिव्यांगता समावेशन की आवाज के रूप में सक्रिय हैं।
उनकी प्रकाशित कविता “They Said This is My Fate” इस यात्रा को और गहराई से सामने रखती है। कविता में वह उन धारणाओं को याद करती हैं जिनमें उनकी दिव्यांगता को उनकी नियति मान लिया गया था। आगे चलकर उन्होंने शिक्षा, लेखन और रचनात्मकता के माध्यम से अपने लिए रास्ता बनाया।
लेकिन विनायना की कहानी को केवल “मुश्किलों पर विजय की प्रेरक कहानी” कहकर समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं होगा।
असल सवाल इससे कहीं बड़ा है।
क्या बाधा व्यक्ति में है या व्यवस्था में?
अगर किसी विद्यार्थी के लिए सामान्य पेन पकड़ना कठिन है, तो क्या इसका मतलब यह है कि वह लिख नहीं सकता?
जरूरी नहीं।
अगर कोई डिजिटल माध्यम से बेहतर संवाद कर सकता है, तो क्या उसे कम सक्षम माना जाना चाहिए?
नहीं।
अगर किसी दिव्यांग विद्यार्थी को परीक्षा, कक्षा या नौकरी में अपनी क्षमता प्रदर्शित करने के लिए अलग माध्यम की आवश्यकता है, तो उसे विशेष कृपा समझना भी गलत है।
यही वह दृष्टिकोण है जिसे बदलने की जरूरत है।
भारत का Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 समानता, गैर-भेदभाव, शिक्षा, रोजगार और Accessibility को कानूनी अधिकारों के ढांचे में रखता है। कानून में शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारियां, reasonable accommodation, सार्वजनिक सुविधाओं की Accessibility तथा सूचना एवं संचार तकनीक तक पहुंच जैसे प्रावधान शामिल हैं।
अर्थात Accessibility केवल Ramp लगाने का नाम नहीं है।
Accessibility का अर्थ रास्ता खोलना है
किसी भवन में Ramp नहीं है तो वह बाधा है।
लेकिन केवल Ramp लगा देने से Accessibility पूरी नहीं हो जाती।
अगर लिफ्ट काम नहीं करती, शौचालय सुगम नहीं है, फुटपाथ बाधित हैं, सार्वजनिक परिवहन तक पहुंच नहीं है, सूचना Accessible प्रारूप में उपलब्ध नहीं है या डिजिटल मंच अलग-अलग क्षमताओं वाले लोगों के लिए उपयोगी नहीं है, तो बाधा अभी भी मौजूद है।
केंद्र सरकार का दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग भी Accessibility को भवनों, परिवहन, सूचना एवं संचार तकनीक और सार्वजनिक सेवाओं तक व्यापक पहुंच के रूप में देखता है। विभाग की हालिया जानकारी में यह भी स्पष्ट किया गया है कि Accessibility को केवल कल्याणकारी उपाय नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में देखा गया है।
यही सोच विनायना के संदेश को महत्वपूर्ण बनाती है—Accessibility किसी को विशेष सुविधा देना नहीं, बल्कि अनावश्यक बाधाओं को हटाना है।
शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी सीख
विनायना का विश्वविद्यालय तक पहुंचना उपलब्धि है, लेकिन व्यवस्था के लिए इससे भी बड़ा प्रश्न है कि कितने बच्चे ऐसी बाधाओं के कारण शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर रह जाते हैं।
हर बच्चे की जरूरत समान नहीं होती।
किसी को सहायक तकनीक चाहिए, किसी को अतिरिक्त समय, किसी को Accessible अध्ययन सामग्री, किसी को परीक्षा में उचित सहायता और किसी को केवल ऐसा वातावरण चाहिए जिसमें उसे उसकी शारीरिक स्थिति के आधार पर कमतर न समझा जाए।
RPwD Act शैक्षणिक संस्थानों से भवन और सुविधाओं को Accessible बनाने तथा व्यक्ति की जरूरत के अनुसार reasonable accommodation उपलब्ध कराने की अपेक्षा करता है।
इसलिए समावेशी शिक्षा कोई दया की व्यवस्था नहीं है। यह अधिकार आधारित शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा है।
तकनीक को सुविधा नहीं, अवसर बनाना होगा
विनायना की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू Technology भी है।
आज डिजिटल उपकरण किसी व्यक्ति के लिए केवल मनोरंजन या सुविधा का माध्यम नहीं हैं। कई दिव्यांग लोगों के लिए यही शिक्षा, रोजगार, लेखन, संवाद और आत्मनिर्भरता का रास्ता बन सकते हैं।
इसलिए डिजिटल Accessibility को भी उतनी ही गंभीरता से लेना होगा जितनी भौतिक Accessibility को।
सरकारी विभागों की वेबसाइट से लेकर विश्वविद्यालय के पोर्टल, ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल पुस्तकालय और शिक्षण सामग्री तक—यदि ये Accessible नहीं हैं तो डिजिटल युग में भी बड़ी संख्या में लोग पीछे छूट सकते हैं।
दिव्यांगता व्यक्ति की पूरी पहचान नहीं
विनायना की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है कि किसी व्यक्ति को केवल उसकी दिव्यांगता से परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए।
वह Cerebral Palsy के साथ जीवन जीती हैं, लेकिन उनकी पहचान केवल Cerebral Palsy नहीं है।
वह शिक्षिका हैं, कवयित्री हैं, लेखिका हैं, रचनाकार हैं और सामाजिक संवाद की सक्रिय आवाज हैं।
यही अंतर हमें समझना होगा।
किसी व्यक्ति की कठिनाई को स्वीकार करना और उसे उसकी पूरी पहचान बना देना—दो अलग बातें हैं।
समाज को भी अपनी भाषा बदलनी होगी
दिव्यांगता के प्रति संवेदनशीलता केवल सरकारी योजनाओं से नहीं आएगी। इसके लिए सामाजिक सोच में भी बदलाव जरूरी है।
“बेचारी”, “लाचार”, “कुछ कर नहीं सकती” जैसी धारणाएं उतनी ही बड़ी बाधा हैं जितनी सीढ़ियां, संकरी दरवाजे या inaccessible websites।
कई बार व्यक्ति को सबसे ज्यादा चोट उसकी शारीरिक स्थिति से नहीं, बल्कि समाज की अपेक्षाओं से लगती है।
इसलिए दिव्यांगता पर बातचीत करते समय सहानुभूति के साथ सम्मान और सम्मान के साथ समानता जरूरी है।
विनायना से आगे का सवाल
विनायना ने अपनी आवाज खोज ली। उन्होंने अपनी परिस्थितियों के भीतर रास्ते बनाए और आज दूसरों को पढ़ा रही हैं।
लेकिन हर व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अकेले हर बाधा से लड़कर रास्ता बनाए।
व्यवस्था का दायित्व है कि रास्ते पहले से सुगम हों।
स्कूल Accessible हों।
कॉलेज Accessible हों।
कार्यालय Accessible हों।
सड़क और परिवहन Accessible हों।
डिजिटल दुनिया Accessible हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—लोगों की सोच Accessible हो।
संपादकीय निष्कर्ष
विनायना खुराना की कहानी हमें प्रेरित जरूर करती है, लेकिन उससे भी ज्यादा हमें आईना दिखाती है।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि दिव्यांग व्यक्ति हमारे बनाए हुए रास्ते पर चल सकता है या नहीं।
सवाल यह होना चाहिए कि हमने रास्ता उसके लिए बनाया ही क्यों नहीं?
समावेश का वास्तविक अर्थ यही है कि किसी व्यक्ति को अपनी क्षमता साबित करने के लिए रोज नई बाधाओं से युद्ध न करना पड़े।
दिव्यांगता को दया नहीं, अधिकार चाहिए।
सहायता नहीं, समान अवसर चाहिए।
विशेष व्यवहार नहीं, सुगम व्यवस्था चाहिए।
और सबसे बढ़कर—
