2027 को लेकर दुनिया में एक नई चिंता उभर रही है—क्या जलवायु परिवर्तन और संभावित Super El Niño मिलकर वैश्विक खाद्य संकट पैदा कर सकते हैं?
इस सवाल को केवल सोशल मीडिया की सनसनी मानकर खारिज करना भी गलत होगा और यह मान लेना भी कि 2027 में पूरी दुनिया अकाल और भुखमरी की चपेट में आ जाएगी, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
लेकिन खतरे की घंटी जरूर बज चुकी है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने जून 2026 में चेतावनी दी थी कि विकसित हो रहा El Niño आने वाले महीनों में वैश्विक तापमान और वर्षा के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है तथा चरम मौसम की घटनाओं का जोखिम बढ़ा सकता है।
अब आर्थिक विश्लेषणों ने इस मौसमीय संकट को खाद्य, उर्वरक और महंगाई के संकट से जोड़ दिया है।
JPMorgan के विश्लेषण के अनुसार 2026 के अंत तक बहुत मजबूत El Niño की संभावना 81 प्रतिशत और उसके 2027 तक बने रहने की संभावना 97 प्रतिशत आंकी गई है। बैंक ने चेतावनी दी है कि El Niño, उर्वरक आपूर्ति में व्यवधान और ऊर्जा कीमतों का संयोजन 2027 में खाद्य महंगाई को काफी बढ़ा सकता है।
लेकिन असली कहानी El Niño से बड़ी है
El Niño कोई नया राक्षस नहीं है। यह प्रशांत महासागर के समुद्री तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाला प्राकृतिक चक्रीय परिवर्तन है।
समस्या यह है कि आज यह घटना एक पहले से गर्म हो चुकी पृथ्वी पर घट रही है।
यानी हमारे सामने दो प्रक्रियाएं एक साथ हैं—
El Niño → मौसम में असामान्य बदलाव
Global Warming → पहले से अधिक गर्म ग्रह
और इनके ऊपर तीसरी परत है—
भूराजनीतिक तनाव → तेल, गैस, खाद और परिवहन की लागत।
यहीं से संभावित खाद्य संकट गंभीर हो जाता है।
क्या पूरी दुनिया इसकी चपेट में आएगी?
नहीं, एक समान रूप से नहीं।
El Niño का अर्थ दुनिया के हर देश में सूखा नहीं होता। कहीं सूखा पड़ सकता है तो कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सूखे और गर्मी का जोखिम बढ़ सकता है, जबकि दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में अत्यधिक बारिश हो सकती है।
इसलिए इसे Global Food Collapse कहना अभी अतिशयोक्ति होगी।
लेकिन वैश्विक खाद्य बाजार आपस में जुड़े हुए हैं।
अगर भारत में चीनी या चावल का उत्पादन प्रभावित होता है, ब्राजील में फसल प्रभावित होती है, दक्षिण-पूर्व एशिया में कॉफी या चावल पर असर पड़ता है और पश्चिम एशिया में उर्वरक आपूर्ति बाधित होती है, तो समस्या केवल उन देशों तक सीमित नहीं रहती।
किसान की समस्या अंतरराष्ट्रीय बाजार की समस्या बन जाती है।
भारत क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत दुनिया की सबसे बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और करोड़ों लोगों की आजीविका मानसून पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर है।
El Niño का भारतीय मानसून पर असर पड़ सकता है, लेकिन यह कोई यांत्रिक नियम नहीं है कि हर El Niño में भारत में अकाल ही पड़ेगा।
इसलिए हमें डर फैलाने के बजाय तीन चीजों पर नजर रखनी चाहिए—
पानी, फसल और कीमत।
अगर वर्षा असमान होती है, तो केवल कुल बारिश का आंकड़ा पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि बारिश कब हुई, कितनी तीव्रता से हुई और कितने दिनों तक सूखा रहा।
किसान के लिए 1000 मिलीमीटर बारिश का आंकड़ा तब बेकार हो सकता है, जब बारिश कुछ दिनों में बाढ़ के रूप में आ जाए और अगले कई सप्ताह खेत सूखे रहें।
सबसे बड़ा खतरा ‘भोजन की कमी’ नहीं, ‘भोजन की कीमत’ भी हो सकता है
यह अंतर समझना जरूरी है।
भारत के पास खाद्यान्न भंडारण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सरकारी हस्तक्षेप की क्षमता है। इसलिए किसी मौसमीय घटना के कारण तत्काल देशव्यापी भुखमरी की कल्पना करना उचित नहीं है।
लेकिन खाद्य महंगाई अलग प्रश्न है।
JPMorgan के विश्लेषण में अनुमान है कि El Niño अकेले वैश्विक खाद्य महंगाई में लगभग 0.7 प्रतिशत अंक जोड़ सकता है; यदि ऊर्जा, डीजल, उर्वरक और पैकेजिंग लागत भी बढ़ती है तो दबाव और बड़ा हो सकता है।
और महंगाई का सबसे बड़ा बोझ गरीब परिवार उठाते हैं।
जिस परिवार की आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है, उसके लिए खाद्य कीमतों में मामूली वृद्धि भी जीवन स्तर में बड़ी गिरावट बन जाती है।
उर्वरक का संकट—जिस पर कम चर्चा हो रही है
भविष्य का खाद्य संकट केवल बारिश का संकट नहीं हो सकता।
कृषि को पानी के साथ नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे उर्वरकों की जरूरत है।
यदि भू-राजनीतिक तनावों के कारण गैस और उर्वरक की कीमतें बढ़ती हैं और उसी समय El Niño फसल उत्पादन पर दबाव डालता है, तो किसान के सामने दोहरा संकट होगा—
महंगा उत्पादन + अनिश्चित उत्पादन।
यही वह बिंदु है जहां मौसमीय संकट आर्थिक संकट में बदल सकता है।
JPMorgan ने भारत, इंडोनेशिया और ब्राजील जैसी कृषि-निर्भर उभरती अर्थव्यवस्थाओं को विशेष रूप से संवेदनशील बताया है।
क्या Global Warming का डर सच हो रहा है?
इसका उत्तर है—जलवायु जोखिम वास्तविक है, लेकिन हर वायरल भविष्यवाणी वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं होती।
आज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि हम El Niño को रोक सकते हैं या नहीं।
हम उसे रोक नहीं सकते।
चुनौती यह है कि क्या हम उसके प्रभाव को कम कर सकते हैं?
और यहां भारत के पास अवसर भी है।
जल संरक्षण, वर्षाजल संचयन, सूखा-रोधी फसलें, स्थानीय बीज, फसल विविधीकरण, बेहतर मौसम पूर्वानुमान, सिंचाई दक्षता, कृषि बीमा और रणनीतिक खाद्यान्न भंडार—ये सभी भविष्य के संकट के खिलाफ सुरक्षा कवच हैं।
उत्तराखंड के लिए भी चेतावनी
हिमालय को इस बहस से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
जलवायु परिवर्तन का अर्थ केवल तापमान बढ़ना नहीं है। वर्षा के पैटर्न में बदलाव, बादल फटना, अत्यधिक वर्षा, लंबे शुष्क दौर, जलस्रोतों का कमजोर होना और कृषि मौसम का बदलना—इनका संयुक्त प्रभाव पहाड़ी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में नौले-धारे, छोटी जलधाराएं, वर्षाजल संचयन और पारंपरिक कृषि प्रणालियां केवल विरासत नहीं हैं; वे भविष्य की जल-सुरक्षा का हिस्सा हैं।
आज जिस पहाड़ी जलस्रोत को हम उपेक्षित छोड़ रहे हैं, कल वही किसी गांव की खाद्य सुरक्षा का आधार हो सकता है।
अब सवाल सरकारों से है
यदि वैज्ञानिक संस्थाएं संभावित बड़े El Niño की चेतावनी दे रही हैं और आर्थिक विश्लेषक खाद्य एवं उर्वरक संकट का जोखिम बता रहे हैं, तो सरकारों को संकट आने का इंतजार क्यों करना चाहिए?
2027 की तैयारी 2027 में नहीं, 2026 में होनी चाहिए।
सरकार को अभी से—
- खाद्यान्न भंडार की समीक्षा,
- उर्वरक आपूर्ति की सुरक्षा,
- दाल और तिलहन उत्पादन को बढ़ावा,
- सूखा प्रभावित क्षेत्रों की पहचान,
- जलाशयों और भूजल की निगरानी,
- किसानों के लिए मौसम आधारित सलाह,
- खाद्य कीमतों की निगरानी,
- और कमजोर परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा
पर काम करना चाहिए।
निष्कर्ष: डर नहीं, तैयारी चाहिए
2027 में पूरी दुनिया भुखमरी की चपेट में आ जाएगी—यह अभी प्रमाणित भविष्यवाणी नहीं है।
लेकिन यह कहना भी खतरनाक होगा कि कोई खतरा नहीं है।
वास्तविक चेतावनी यह है कि एक संभावित मजबूत El Niño ऐसे समय आ रहा है जब दुनिया पहले ही जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा संकट और कृषि लागत की चुनौतियों से जूझ रही है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि—
“क्या 2027 में दुनिया भूखी मर जाएगी?”
सवाल होना चाहिए—
“अगर 2027 में मौसम ने हमारी परीक्षा ली, तो क्या हमारी खाद्य व्यवस्था उस परीक्षा के लिए तैयार है?”
क्योंकि इतिहास हमें बताता है कि अकाल केवल बारिश की कमी से नहीं आते।
अकाल तब बनते हैं जब प्रकृति का झटका कमजोर शासन, कमजोर बाजार, गरीबी और कमजोर तैयारी से टकराता है।
और यही वह जगह है जहां El Niño से ज्यादा महत्वपूर्ण मानव की तैयारी हो जाती है।
