उत्तराखंड में SIR की अंतिम मतदाता सूची सामने आ गई है। अब असली सवाल आंकड़े से आगे का है।
SIR से पहले उत्तराखंड में 79,60,762 मतदाता थे। अंतिम सूची में यह संख्या घटकर 71,58,949 रह गई। यानी करीब 8.02 लाख मतदाता कम हुए—लगभग 10.1 प्रतिशत।
यहां एक बात साफ होनी चाहिए। मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित और दोहरे नाम हटाना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जरूरी प्रक्रिया है। इसलिए केवल बड़ी संख्या में नाम कम होना अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है।
लेकिन उत्तराखंड जैसे राज्य में यह आंकड़ा एक बड़ा लोकतांत्रिक सवाल जरूर खड़ा करता है।
क्यों?
क्योंकि यहां चुनाव कई बार हजारों नहीं, सैकड़ों वोटों के अंतर से तय हुए हैं।
2022 में अल्मोड़ा विधानसभा सीट पर जीत का अंतर सिर्फ 127 वोट था। द्वाराहाट में 182, श्रीनगर में 587, मंगलौर में 598 और टिहरी में 951 वोट। धर्चूला में 1,118 और गदरपुर में 1,120 वोट का अंतर रहा।
अब जरा इस तस्वीर को सामने रखिए—
एक तरफ 8 लाख से अधिक नामों की कमी।
दूसरी तरफ 127 वोट से तय हुई विधानसभा सीट।
यहीं से सवाल पैदा होता है।
यह कहना गलत होगा कि हटाए गए 8 लाख नाम चुनावी परिणाम बदल देंगे। लेकिन यह सवाल पूछना पूरी तरह जायज है कि इन नामों में पात्र मतदाता कितने थे और उन्हें सूची से बाहर क्यों किया गया?
और इसका जवाब केवल राज्य का कुल आंकड़ा देकर नहीं दिया जा सकता।
आयोग को विधानसभा और बूथ स्तर तक आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए।
किस विधानसभा में कितने नाम हटे?
कितने मृत पाए गए?
कितने स्थायी रूप से स्थानांतरित मिले?
कितने दोहरे नाम थे?
कितने लोगों के दस्तावेज या सत्यापन पूरे नहीं हो पाए?
कितने लोगों ने दावा-आपत्ति की?
कितने नाम वापस जोड़े गए?
और सबसे महत्वपूर्ण—
जिन सीटों पर पिछली बार जीत का अंतर एक हजार से भी कम था, वहां SIR के दौरान कितने मतदाता सूची से बाहर हुए?
यह तुलना सार्वजनिक होनी चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में मतदाता सूची सिर्फ प्रशासनिक कागज नहीं है। यही वह सूची है जो तय करती है कि मतदान के दिन किस नागरिक को लोकतंत्र में अपनी आवाज डालने का अधिकार मिलेगा।
SIR के दौरान उत्तराखंड में 1.3 लाख से अधिक Form-7 आवेदन नाम हटाने के लिए आए थे। इनमें लगभग 85 प्रतिशत आवेदन देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल से जुड़े बताए गए।
इन जिलों में आबादी, प्रवास, शहरीकरण और लगातार बदलते पते के कारण मतदाता सूची का सत्यापन निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है।
लेकिन चुनौती जितनी बड़ी हो, पारदर्शिता की जरूरत उतनी ही बड़ी होती है।
इसलिए अब राजनीतिक दलों को भी केवल बयान देने के बजाय बूथवार मतदाता सूची का सामाजिक ऑडिट करना चाहिए।
और चुनाव आयोग को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि SIR में छूट गया कोई पात्र मतदाता 2027 के विधानसभा चुनाव में मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए। अंतिम सूची जारी होने के बाद आयोग ने ऐसे छूटे पात्र मतदाताओं की पहचान और पुनः नामांकन के लिए विशेष अभियान का निर्देश दिया है।
क्योंकि मतदाता सूची को शुद्ध करना जितना जरूरी है, मतदाता को बचाना उससे कम जरूरी नहीं।
उत्तराखंड में अगला चुनाव किसके पक्ष में जाएगा—यह कहना न पत्रकारिता का काम है, न अभी संभव है।
लेकिन एक सवाल आज जरूर पूछा जा सकता है—
जब एक विधायक 127 वोट से चुना जा सकता है, तब आठ लाख मतदाताओं की कमी का बूथवार हिसाब जनता के सामने क्यों नहीं होना चाहिए?
यही SIR की असली पारदर्शिता की परीक्षा है।
