क्या SIR पर चुनाव आयोग को फिर सोचना पड़ा?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना बताया गया था। लेकिन अब SIR पूरी होने के बाद चुनाव आयोग ने उन्हीं राज्यों में विशेष अभियान चलाने का फैसला किया है, जहां यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
इस अभियान के तहत बूथ लेवल अधिकारी यानी BLO घर-घर जाकर उन मतदाताओं की पहचान करेंगे, जिनके नाम SIR से पहले की मतदाता सूची में थे, लेकिन नई सूची में नहीं हैं। पात्र पाए जाने पर उन्हें दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराने में सहायता दी जाएगी। आयोग ने युवाओं और पहली बार मतदाता बनने वालों को भी अभियान में शामिल किया है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—
अगर SIR के बाद छूटे हुए पात्र मतदाताओं को फिर घर-घर जाकर खोजा जा सकता है, तो वे पहली बार में छूटे ही क्यों?
क्या यह चुनाव आयोग का सामान्य मतदाता पंजीकरण अभियान है या SIR की प्रक्रिया में रह गई कमियों को सुधारने की कवायद?
उत्तराखंड का आंकड़ा इस सवाल को और गंभीर बनाता है। SIR शुरू होने से पहले राज्य की मतदाता सूची में 79,60,762 मतदाता थे। 3 अक्टूबर को जारी अंतिम सूची में यह संख्या 71,58,949 रह गई। यानी पुराने आंकड़े की तुलना में लगभग 8 लाख की कमी हुई।
आयोग के सामने अब केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि कितने नाम हटे। जनता को यह भी जानना चाहिए कि—
कितने नाम मृत मतदाताओं के थे?
कितने लोग स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके थे?
कितने नाम दोहराव के कारण हटे?
और कितने वास्तविक, जीवित और पात्र मतदाता SIR की प्रक्रिया में छूट गए?
क्योंकि मतदाता सूची से किसी नाम का हटना केवल प्रशासनिक आंकड़े का बदलना नहीं है। वह किसी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा विषय है।
सबसे दिलचस्प स्थिति यह है कि SIR के दौरान नाम सूची में बनाए रखने के लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनाई गई और अब SIR पूरी होने के बाद छूटे लोगों को फिर से जोड़ने के लिए सामान्य मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया का सहारा लिया जा रहा है। चुनाव अधिकारियों के अनुसार आगे पात्र लोगों के पुनः नामांकन के लिए सामान्य नियमों के तहत प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
इसलिए सवाल यह नहीं कि चुनाव आयोग ने यू-टर्न लिया या नहीं।
सवाल यह है कि क्या SIR के बाद आयोग स्वयं यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी प्रक्रिया में कोई पात्र मतदाता बाहर न रह जाए?
अगर जवाब हां है, तो यह स्वागतयोग्य सुधार है।
लेकिन तब एक और सवाल जरूरी है—
जिस गलती को अब घर-घर जाकर सुधारा जाएगा, उसका हिसाब भी घर-घर की जनता को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?
चुनाव आयोग को उत्तराखंड में बूथवार आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए—SIR से पहले कितने मतदाता थे, कितने नाम हटे, हटाने का कारण क्या था, कितने नाम दावों-आपत्तियों के बाद वापस जुड़े और अब विशेष अभियान में कितने छूटे हुए पात्र मतदाताओं की पहचान हुई।
लोकतंत्र में मतदाता सूची सिर्फ सरकारी रजिस्टर नहीं होती।
वह नागरिक की लोकतांत्रिक मौजूदगी का दस्तावेज होती है।
इसलिए SIR का अंतिम मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि सूची कितनी छोटी या बड़ी हुई।
असल सवाल यह होना चाहिए—
क्या सूची में हर पात्र नागरिक मौजूद है?
और यदि इसके लिए चुनाव आयोग को SIR खत्म होने के बाद फिर घर-घर जाना पड़ रहा है, तो इस अभियान को केवल नया प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि SIR से मिले सबक के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
