न्याय का उद्देश्य किसी विवाद को लंबा खींचना नहीं, उसका समाधान करना है। लेकिन पारिवारिक अदालतों की हकीकत कई बार इस मूल उद्देश्य के उलट दिखाई देती है। पति-पत्नी के बीच शुरू हुआ विवाद वर्षों तक चलने वाला मुकदमा बन जाता है और देखते-देखते उसकी कीमत केवल दो पक्ष नहीं, पूरा परिवार चुकाने लगता है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने गुवाहाटी में आयोजित Family Courts Conference में इसी गंभीर पक्ष की ओर ध्यान खींचा। उन्होंने पारिवारिक विवादों में मुकदमेबाजी को हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने—‘Weaponisation of Litigation’—की समस्या का उल्लेख किया। उनका संकेत उन परिस्थितियों की ओर था, जहां लगातार अदालत की तारीखें, खर्च, तनाव और कानूनी प्रक्रिया स्वयं दूसरे पक्ष के लिए परेशानी का माध्यम बन सकती हैं।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत में मामला दर्ज होना अपने आप में न्याय मिल जाना नहीं है। न्याय तब सार्थक है जब वह समय पर, निष्पक्ष और मानवीय तरीके से मिले।
पारिवारिक मुकदमों में देरी का असर सामान्य मुकदमों से अलग होता है। यहां विवाद के बीच बच्चे होते हैं, बुजुर्ग होते हैं, साझा संपत्ति और आर्थिक जिम्मेदारियां होती हैं और सबसे बढ़कर रिश्तों का भविष्य होता है। वर्षों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई बच्चों को माता-पिता के विवाद के बीच खड़ा कर सकती है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए लगातार अदालत जाना और वकीलों का खर्च उठाना स्वयं एक बड़ी चुनौती हो सकता है।
इसीलिए ‘तारीख पर तारीख’ का सवाल केवल न्यायिक व्यवस्था की गति का सवाल नहीं है। यह न्याय की गुणवत्ता और उसकी मानवीय संवेदनशीलता का भी सवाल है।
लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। जस्टिस नागरत्ना की ये बातें गुवाहाटी में आयोजित न्यायिक सम्मेलन में दिए गए संबोधन का हिस्सा हैं। इन्हें सुप्रीम कोर्ट के किसी नए बाध्यकारी फैसले या नए कानूनी नियम के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। उनकी टिप्पणी एक ऐसी न्याय व्यवस्था की जरूरत पर केंद्रित है, जिसमें पारिवारिक विवादों को केवल कानूनी धाराओं और ‘cause of action’ तक सीमित न करके परिवार के व्यापक संदर्भ में देखा जाए।
मध्यस्थता इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन मध्यस्थता भी कोई जादुई समाधान नहीं है। जहां हिंसा, दबाव, भय या गंभीर असमानता हो, वहां कमजोर पक्ष की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। इसलिए मध्यस्थता और न्यायिक निर्णय के बीच संतुलन जरूरी है—न तो हर मामले को मुकदमे में धकेला जाए और न हर मामले को समझौते की मेज पर।
Family Court का अर्थ केवल ऐसी अदालत नहीं होना चाहिए जहां पति-पत्नी अपने-अपने अधिकार साबित करने पहुंचें। उसे ऐसी न्यायिक व्यवस्था बनना होगा जहां यह भी देखा जाए कि विवाद के बीच बच्चे किस स्थिति में हैं, परिवार पर आर्थिक बोझ कितना बढ़ रहा है और क्या विवाद का समाधान कम से कम नुकसान के साथ संभव है।
सबसे गंभीर प्रश्न यही है—क्या न्याय पाने की प्रक्रिया स्वयं किसी व्यक्ति के लिए सजा बन सकती है?
यदि उत्तर कुछ मामलों में हां है, तो सुधार केवल कानून में नहीं, न्यायिक प्रक्रिया की संस्कृति में भी चाहिए।
तेज सुनवाई, अनावश्यक तारीखों पर नियंत्रण, प्रभावी मध्यस्थता, प्रशिक्षित पारिवारिक परामर्श, बच्चों के सर्वोत्तम हित की प्राथमिकता और कमजोर पक्षों की सुरक्षा—Family Courts की कार्यप्रणाली में इन सबका मजबूत स्थान होना चाहिए।
क्योंकि पारिवारिक मुकदमे में फैसला आने के बाद भी जिंदगी खत्म नहीं होती। अदालत की फाइल बंद हो जाती है, लेकिन पक्षकारों और बच्चों को उसी समाज में आगे का जीवन जीना होता है।
न्याय की असली सफलता केवल यह नहीं कि फैसला किसके पक्ष में आया। सफलता यह भी है कि न्याय तक पहुंचने की प्रक्रिया ने इंसान को कितना कम तोड़ा।
