खोजी पत्रकारिता, आरटीआई और समाचार स्रोतों की गोपनीयता पर जताई चिंता; धारा 17 में पत्रकारिता छूट बहाल करने की मांग
नई दिल्ली। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (डीपीडीपी एक्ट) को लेकर पत्रकार संगठनों ने प्रेस की स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता पर इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (जेसीआई) ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका का समर्थन करते हुए कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट का प्रावधान करने की मांग की है।

जेसीआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुराग सक्सेना के अनुसार, कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट संरक्षण नहीं होने से भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं और जनहित से जुड़े मामलों की खोजी रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है। पत्रकारिता के दौरान कई बार ऐसी व्यक्तिगत जानकारियों का उपयोग करना पड़ता है, जिनके आधार पर सार्वजनिक संस्थानों और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय की जा सकती है।
संगठन का कहना है कि यदि व्यक्तिगत डेटा के उपयोग और प्रकाशन के लिए हर परिस्थिति में संबंधित व्यक्ति की सहमति अनिवार्य हो, तो जनहित में की जाने वाली पड़ताल के सामने व्यावहारिक और कानूनी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
धारा 17 में पत्रकारिता छूट बहाल करने की मांग
जेसीआई ने डीपीडीपी एक्ट की धारा 17 में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट और व्यापक छूट शामिल करने की मांग की है। संगठन के मुताबिक, पहले के विधायी मसौदे में पत्रकारिता के लिए छूट का प्रावधान प्रस्तावित था, जिसे अंतिम कानून में शामिल नहीं किया गया।
संगठन का तर्क है कि व्यक्तिगत निजता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके संरक्षण के नाम पर जनहित में तथ्य जुटाने और प्रकाशित करने की पत्रकारिता की भूमिका बाधित नहीं होनी चाहिए।
समाचार स्रोतों की गोपनीयता पर भी सवाल
जेसीआई ने अधिनियम की धारा 36 के तहत सरकार को जानकारी मांगने से संबंधित शक्तियों पर भी चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि खोजी पत्रकारिता में कई बार ऐसे स्रोत महत्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध कराते हैं, जिनकी पहचान उजागर होने पर उनकी सुरक्षा और स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए पत्रकारों के सूचना स्रोतों की गोपनीयता को कानूनी संरक्षण देने की आवश्यकता बताई गई है।
आरटीआई कानून में संशोधन पर भी आपत्ति
जेसीआई ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में पूर्ववर्ती व्यवस्था बहाल करने और डीपीडीपी एक्ट की धारा 44(3) के प्रभावों की समीक्षा करने की मांग की है।
इस प्रावधान में संशोधन के बाद व्यक्तिगत जानकारी के सार्वजनिक किए जाने पर व्यापक प्रतिबंध का प्रश्न उठता है। पत्रकार संगठनों और आरटीआई कार्यकर्ताओं की चिंता है कि इसका असर सरकारी कामकाज में पारदर्शिता, सार्वजनिक जवाबदेही और जनहित से जुड़ी सूचनाओं तक पहुंच पर पड़ सकता है।
17 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई
डीएनपीए की याचिका पर 27 अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने निजता के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित है। फिलहाल न्यायालय ने कानून की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। India News +2
जेसीआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुराग सक्सेना ने बताया कि संगठन पत्रकारों और पत्रकारिता से जुड़े हितों को न्यायालय के समक्ष रखने के लिए हस्तक्षेप याचिका (इंटरवेंशन एप्लीकेशन) दाखिल करने पर भी विचार कर रहा है।
निजता की सुरक्षा के साथ प्रेस की स्वतंत्रता भी जरूरी
इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न यह है कि नागरिकों की व्यक्तिगत निजता की रक्षा और पत्रकारिता के माध्यम से सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
निजता का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है, वहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में भ्रष्टाचार, सरकारी अनियमितताओं और सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग के लिए पत्रकारों को उचित कानूनी संरक्षण मिलना जरूरी है।
जेसीआई ने देशभर के पत्रकारों से प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारिता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाने की अपील की है।
संपादकीय दृष्टिकोण: यह विवाद केवल मीडिया संस्थानों का कानूनी मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध आम नागरिक के सूचना पाने के अधिकार से भी है। यदि पत्रकार किसी सार्वजनिक पदाधिकारी की संपत्ति, सरकारी निर्णयों, प्रशासनिक कार्रवाई या भ्रष्टाचार से जुड़े तथ्यों की पड़ताल करते समय अनावश्यक कानूनी बाधाओं में उलझते हैं, तो इसका असर सार्वजनिक जवाबदेही पर भी पड़ सकता है।
हालांकि पत्रकारिता के नाम पर किसी नागरिक की निजता और व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग की अनुमति भी नहीं दी जा सकती। आवश्यकता ऐसी स्पष्ट कानूनी व्यवस्था की है, जो जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता को संरक्षण दे और साथ ही व्यक्तिगत निजता के दुरुपयोग को रोकने के लिए जवाबदेही भी तय करे।
संपादन संबंधी तथ्य-जांच: धारा 17 में पत्रकारिता छूट की मांग जेसीआई की मांग के रूप में प्रस्तुत की गई है, न कि वर्तमान कानून में पहले से मौजूद छूट के रूप में। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई लंबित है।
स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स | सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर | ईटी गवर्नमेंट
