अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई या आजीविका पर प्रहार?
कोटद्वार में नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान ने एक बार फिर उस पुराने सवाल को सामने ला खड़ा किया है कि शहरों को व्यवस्थित बनाने और नागरिकों की आजीविका बचाने के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। सड़क, नाली, फुटपाथ और सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना निस्संदेह प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन जब इस कार्रवाई की जद में वर्षों से स्वरोजगार कर रहे छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी संचालक और निम्न आय वर्ग के परिवार आते हैं, तब मामला केवल कानून का नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का भी बन जाता है।
नगर निगम का तर्क है कि अतिक्रमण शहर के विकास में बाधा है, यातायात प्रभावित करता है और सार्वजनिक सुविधाओं पर दबाव बढ़ाता है। यह तर्क अपनी जगह सही है। किसी भी शहर को नियमों के अनुसार विकसित होना चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उन लोगों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था तैयार की गई है जिनकी रोजी-रोटी इसी स्थान पर निर्भर है? क्या दशकों से बसे परिवारों और छोटे व्यापारियों को केवल नोटिस देकर हटाना पर्याप्त है?
भारत के अधिकांश शहरों की वास्तविकता यह है कि रोजगार के सीमित अवसरों के कारण हजारों लोग फुटपाथ, सड़क किनारे और छोटे अस्थायी ढांचों के माध्यम से अपना जीवनयापन करते हैं। इन्हें हटाना आसान है, लेकिन इनके लिए सम्मानजनक पुनर्वास और वैकल्पिक व्यापार स्थल उपलब्ध कराना कहीं अधिक कठिन और आवश्यक कार्य है। यदि प्रशासन केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित रहे और पुनर्वास की जिम्मेदारी से पीछे हट जाए, तो ऐसी कार्रवाई सामाजिक असंतोष और आर्थिक संकट को जन्म दे सकती है।
कोटद्वार जैसे शहरों में विकास की आवश्यकता है, लेकिन विकास का अर्थ केवल खाली कराई गई भूमि नहीं होना चाहिए। विकास तब सार्थक होगा जब सड़कें भी चौड़ी हों और किसी गरीब का चूल्हा भी न बुझे। नगर निगम, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को मिलकर ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा के साथ-साथ प्रभावित परिवारों और स्वरोजगार से जुड़े लोगों के हितों का भी संरक्षण हो।
कानून का शासन आवश्यक है, लेकिन संवेदनशील शासन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। बुलडोजर और नोटिस प्रशासनिक उपकरण हो सकते हैं, परंतु स्थायी समाधान संवाद, नियोजन और पुनर्वास से ही निकलता है। कोटद्वार को आज इसी संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, ताकि शहर का विकास भी हो और नागरिकों की आजीविका भी सुरक्षित रहे।
