संपादकीय: अधिकार, नैतिकता और देह व्यापार—सुप्रीम कोर्ट के फैसले का व्यापक अर्थ
देह व्यापार को लेकर भारतीय समाज में लंबे समय से नैतिकता, कानून और मानवाधिकारों के बीच एक जटिल बहस चलती रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह स्पष्ट किया जाना कि अपनी इच्छा से देह व्यापार करने वाली बालिग महिलाओं को उनकी मर्जी के खिलाफ हिरासत में नहीं लिया जा सकता, इस बहस को एक नई दिशा देता है।
इस फैसले को केवल देह व्यापार के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तव में यह निर्णय संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और आत्मनिर्णय के अधिकार की पुनर्पुष्टि है। अदालत ने यह संदेश दिया है कि राज्य का दायित्व नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, न कि उनकी निजी जिंदगी पर अपनी नैतिक धारणाएं थोपना।
भारत में देह व्यापार का प्रश्न हमेशा दो अलग-अलग वास्तविकताओं से जुड़ा रहा है। पहली, मानव तस्करी, शोषण और मजबूरी का शिकार वे महिलाएं जिनके लिए कानून और समाज दोनों को सुरक्षा कवच बनना चाहिए। दूसरी, वे बालिग महिलाएं जो अपनी इच्छा से इस पेशे में हैं। समस्या तब पैदा होती है जब दोनों स्थितियों को एक ही नजरिए से देखा जाता है। परिणामस्वरूप कई बार बचाव और पुनर्वास के नाम पर उन महिलाओं की स्वतंत्रता भी सीमित कर दी जाती है जो स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हैं।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इसी अंतर को रेखांकित करता है। अदालत ने यह नहीं कहा कि देह व्यापार एक आदर्श स्थिति है या इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। बल्कि उसने यह कहा कि किसी व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को केवल सामाजिक असहमति के आधार पर नहीं छीना जा सकता।
यह फैसला समाज के सामने भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है। क्या हम किसी महिला की स्वतंत्रता का सम्मान करने के लिए तैयार हैं, भले ही उसका निर्णय हमारी व्यक्तिगत नैतिक धारणाओं से मेल न खाता हो? लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत यही है कि कानून का आधार अधिकार हों, न कि किसी एक वर्ग की नैतिक मान्यताएं।
हालांकि इस फैसले का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। देश में मानव तस्करी, गरीबी, लैंगिक असमानता और महिलाओं के आर्थिक शोषण की वास्तविकता अभी भी मौजूद है। इसलिए इस निर्णय को देह व्यापार के वैधीकरण या सामाजिक स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार और समाज की जिम्मेदारी बनी रहती है कि वे ऐसी परिस्थितियां पैदा करें जहां किसी महिला को आर्थिक विवशता के कारण इस पेशे में न आना पड़े।
अंततः यह फैसला हमें एक मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत की याद दिलाता है—राज्य का काम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है, उनके जीवन के हर निर्णय का संरक्षक बनना नहीं। मानव तस्करी और शोषण के खिलाफ कठोर कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन वयस्क और सक्षम व्यक्तियों की स्वतंत्रता का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। यही किसी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।
