संपादकीय: जब तलाक का मुकदमा उम्र से लंबा हो जाए
भारतीय समाज में विवाह को केवल एक कानूनी अनुबंध नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था माना जाता है। यही कारण है कि शादी को सात जन्मों का बंधन कहकर इसकी स्थायित्व और पवित्रता पर जोर दिया जाता है। लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में वैवाहिक संबंधों में बढ़ते विवाद और उनके समाधान में होने वाली अत्यधिक देरी एक गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं।
लखनऊ के एक डॉक्टर दंपति का मामला इस विडंबना का जीवंत उदाहरण है। वर्ष 2002 में शुरू हुआ तलाक का मुकदमा 24 वर्ष बाद भी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाया है। फैमिली कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद मामला फिर उसी अदालत में लंबित है, जहां से इसकी शुरुआत हुई थी। इस दौरान पति 62 वर्ष और पत्नी 55 वर्ष की हो चुकी हैं। उनके बच्चे बड़े होकर अपने जीवन में स्थापित हो गए, लेकिन माता-पिता का कानूनी संघर्ष अब भी जारी है।
यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि उस न्यायिक व्यवस्था का प्रतिबिंब है जिसमें पारिवारिक विवादों का समाधान वर्षों नहीं, बल्कि दशकों में होता है। जब किसी दंपति को अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष अदालतों के चक्कर लगाने में बिताने पड़ें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या न्याय केवल निर्णय का नाम है, या समय पर निर्णय भी उसकी अनिवार्य शर्त है?
फैमिली कोर्ट का मूल उद्देश्य पारिवारिक विवादों का त्वरित और संवेदनशील समाधान करना था। इन अदालतों की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि पति-पत्नी के बीच के विवाद सामान्य दीवानी मुकदमों की तरह वर्षों तक न खिंचें। लेकिन आज स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। बढ़ते लंबित मामलों और सीमित न्यायिक संसाधनों के कारण पारिवारिक मुकदमे भी सामान्य मुकदमों की तरह अंतहीन प्रतीक्षा का शिकार हो रहे हैं।
सबसे अधिक नुकसान उन बच्चों को होता है जो माता-पिता के विवाद के बीच बड़े होते हैं। उनका बचपन अदालतों, वकीलों और पारिवारिक तनाव के साये में गुजरता है। कई बार कानूनी लड़ाई इतनी लंबी हो जाती है कि उसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। रिश्ते टूट चुके होते हैं, जीवन आगे बढ़ चुका होता है, लेकिन मुकदमा वहीं खड़ा रहता है।
समय आ गया है कि पारिवारिक विवादों के समाधान के लिए मध्यस्थता, काउंसलिंग और वैकल्पिक विवाद निपटान प्रणालियों को अधिक प्रभावी बनाया जाए। साथ ही फैमिली कोर्टों की संख्या, न्यायाधीशों की नियुक्ति और सुनवाई की गति बढ़ाने पर भी गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।
विवाह का सफल होना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका सम्मानजनक और समयबद्ध समाधान भी है। किसी रिश्ते को बचाने की कोशिश वर्षों तक हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति को पूरी उम्र अदालत की चौखट पर खड़ा रखना न समाज के हित में है और न न्याय के।
जब तलाक का मुकदमा विवाह से भी लंबा चलने लगे, तो यह केवल दो व्यक्तियों की त्रासदी नहीं रह जाती, बल्कि न्याय व्यवस्था के लिए चेतावनी बन जाती है।
