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दिव्यांग अधिकारों की 23 सूत्रीय मांगों को लेकर कानपुर से लखनऊ तक पदयात्रा का ऐलान
कानपुर, 8 जून। दिव्यांगजनों के अधिकारों, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की मांगों को लेकर राष्ट्रीय दिव्यांग पार्टी ने 9 जून 2026 से कानपुर से लखनऊ तक शांति मार्च पदयात्रा आयोजित करने की घोषणा की है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरेन्द्र कुमार ने बताया कि यह पदयात्रा सुबह 9 बजे कानपुर के शास्त्री नगर स्थित सेंट्रल पार्क (बगिया गेट नंबर-4) से प्रारंभ होकर मुख्यमंत्री आवास, लखनऊ तक जाएगी।
पार्टी के अनुसार यह आंदोलन दिव्यांगजन अधिकारों से जुड़ी 23 सूत्रीय मांगों को लेकर किया जा रहा है। प्रमुख मांगों में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 का प्रभावी क्रियान्वयन, सरकारी नौकरियों में आरक्षण कोटा पूर्ण रूप से भरना, चलन क्रिया (लोकोमोटर) दिव्यांगता की सभी श्रेणियों को विभिन्न नौकरियों में अवसर प्रदान करना, दिव्यांग पेंशन को बढ़ाकर 5,000 रुपये प्रतिमाह करना तथा रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, आवास और सामाजिक संरक्षण की गारंटी के लिए सामाजिक समानता कानून बनाना शामिल हैं।
राष्ट्रीय दिव्यांग पार्टी ने देशभर के दिव्यांग संगठनों और उनके पदाधिकारियों से इस पदयात्रा में सहयोग और सहभागिता की अपील की है। पार्टी का कहना है कि दिव्यांग समुदाय लंबे समय से अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के पूर्ण क्रियान्वयन की प्रतीक्षा कर रहा है, लेकिन अनेक मांगें अब भी अधूरी हैं।
राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरेन्द्र कुमार ने कहा कि संगठन लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को सरकार के समक्ष रखेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आंदोलन के दौरान प्रशासनिक कार्रवाई होती है तो कार्यकर्ता उसका सामना करने के लिए तैयार हैं।
यह पदयात्रा ऐसे समय में आयोजित की जा रही है जब दिव्यांगजन कल्याण, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर देशभर में बहस तेज हो रही है। आंदोलन के माध्यम से सरकार का ध्यान दिव्यांगजनों की लंबित मांगों और नीतिगत सुधारों की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया जाएगा।
संपादकीय
अधिकारों की लड़ाई या कल्याणकारी राज्य की परीक्षा?
कानपुर से लखनऊ तक प्रस्तावित यह पदयात्रा केवल एक संगठन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह उस प्रश्न को सामने लाती है कि क्या भारत में दिव्यांगजनों को वास्तव में समान अवसर उपलब्ध हैं?
देश में कानून मौजूद है, नीतियां मौजूद हैं और बजट प्रावधान भी हैं। फिर भी यदि दिव्यांग समुदाय को अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो यह प्रशासनिक और नीतिगत व्यवस्था की सीमाओं की ओर संकेत करता है। सरकारी नौकरियों में आरक्षित पदों का वर्षों तक खाली रहना, सार्वजनिक भवनों और परिवहन की सीमित पहुंच, अपर्याप्त पेंशन और रोजगार के सीमित अवसर आज भी बड़ी चुनौतियां हैं।
दिव्यांगजनों के लिए पांच हजार रुपये मासिक पेंशन की मांग को केवल वित्तीय बोझ के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान सहायता राशि महंगाई और जीवन-यापन की वास्तविक लागत को ध्यान में रखती है? इसी प्रकार रोजगार में अवसरों की मांग भी केवल आरक्षण का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन का प्रश्न है।
हालांकि “रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सौ फीसदी गारंटी” जैसी मांगों के व्यावहारिक और वित्तीय पक्ष पर गंभीर नीति विमर्श आवश्यक है, लेकिन यह मांग इस बात का प्रतीक है कि समाज के एक बड़े वर्ग को अभी भी सुरक्षा और अवसरों की कमी महसूस हो रही है।
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण पदयात्रा और जनआंदोलन नागरिक अधिकारों का हिस्सा हैं। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से न देखें, बल्कि उनके पीछे छिपे सामाजिक और मानवीय प्रश्नों को भी समझें। दूसरी ओर आंदोलनों को भी संवाद और समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और वंचित नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। इसलिए यह पदयात्रा केवल दिव्यांगजनों की मांगों का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के कल्याणकारी राज्य की प्रतिबद्धता की भी परीक्षा है।
