संपादकीय: उत्तराखंड के वन—सामुदायिक स्वामित्व ही संरक्षण का स्थायी मार्ग
उत्तराखंड की पहचान उसके हिमालयी वनों से है। यही वन राज्य की नदियों को जीवन देते हैं, जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं, जैव विविधता को संरक्षण प्रदान करते हैं और लाखों लोगों की आजीविका का आधार हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिन वनों ने सदियों से पहाड़ की सभ्यता को संजोया, आज वही वन जलवायु परिवर्तन, वनाग्नि, अवैज्ञानिक विकास और प्रशासनिक चुनौतियों के दबाव में हैं।
ऐसे समय में वन संरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने खड़ा है—क्या जंगलों की रक्षा केवल सरकारी योजनाओं और विभागीय नियंत्रण से संभव है, या इसके लिए स्थानीय समुदायों की निर्णायक भागीदारी आवश्यक है?
उत्तराखंड का इतिहास इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देता है। चिपको आंदोलन से लेकर वन पंचायत व्यवस्था तक, राज्य ने बार-बार सिद्ध किया है कि जब स्थानीय समाज जंगलों के संरक्षण में सहभागी बनता है, तब परिणाम अधिक प्रभावी और स्थायी होते हैं। वन पंचायतों की अवधारणा इसी सोच पर आधारित थी कि जिन लोगों का जीवन जंगलों से जुड़ा है, वही उनके सबसे अच्छे संरक्षक हो सकते हैं।
वर्तमान समय में वन संरक्षण की चुनौतियां पहले से कहीं अधिक जटिल हो गई हैं। बढ़ते तापमान, घटती वर्षा, सूखते जलस्रोत और हर वर्ष बढ़ती वनाग्नि की घटनाएं हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं। दूसरी ओर, पलायन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक संस्थाएं भी कमजोर हुई हैं। ऐसे में केवल प्रशासनिक आदेशों के भरोसे वन संरक्षण की कल्पना करना व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता।
वास्तविक आवश्यकता यह है कि वन पंचायतों को केवल औपचारिक संस्था न रहने दिया जाए, बल्कि उन्हें वित्तीय संसाधन, तकनीकी सहायता और निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति प्रदान की जाए। स्थानीय युवाओं, महिलाओं और पारंपरिक ज्ञान को वन प्रबंधन से जोड़ा जाए। जलस्रोत संरक्षण, वनाग्नि नियंत्रण, औषधीय पौधों के संवर्धन और इको-टूरिज्म जैसी गतिविधियों में समुदायों को भागीदार बनाया जाए।
वनों को केवल राजस्व या कार्बन क्रेडिट के दृष्टिकोण से देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। जंगलों का मूल्य उनकी लकड़ी या आर्थिक उपयोगिता से कहीं अधिक है। वे जल सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, जैव विविधता और सामाजिक स्थिरता के आधार स्तंभ हैं। इसलिए किसी भी वन नीति का केंद्र स्थानीय समुदायों और पर्यावरणीय संतुलन को होना चाहिए, न कि केवल आर्थिक लाभ को।
उत्तराखंड के वनों की सुरक्षा बंद कमरों में बनाई गई फाइलों और योजनाओं से सुनिश्चित नहीं होगी। वह तब संभव होगी जब गांव, वन पंचायतें और स्थानीय समाज स्वयं को जंगलों का हितधारक नहीं, बल्कि उनका संरक्षक समझें। राज्य की पर्यावरणीय सुरक्षा, जल सुरक्षा और सतत विकास का मार्ग सामुदायिक स्वामित्व, जनभागीदारी और स्थानीय उत्तरदायित्व से होकर ही गुजरता है।
यदि उत्तराखंड अपने वनों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना चाहता है, तो उसे जंगलों के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्ते को पुनर्जीवित करना होगा। क्योंकि हिमालय के जंगलों को बचाने की सबसे बड़ी शक्ति न तो किसी कार्यालय में बैठी है और न किसी नीति दस्तावेज में, बल्कि उन गांवों में है जिनका जीवन आज भी जंगलों की सांसों से जुड़ा हुआ है।
