संपादकीय
“चकबंदी पर 100 करोड़: पहाड़ की बिखरी जमीन को क्या मिल पाएगा नया जीवन?”
उत्तराखंड सरकार द्वारा चकबंदी कराने वाले गांवों के लिए 100 करोड़ रुपये के कॉर्पस फंड और 100 प्रतिशत सब्सिडी आधारित प्रोत्साहन नीति की घोषणा एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और सामाजिक पहल मानी जा सकती है। विशेष रूप से पहाड़ी जिलों में, जहां खेती योग्य भूमि पीढ़ियों से छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती चली गई है, वहां चकबंदी केवल राजस्व सुधार नहीं बल्कि ग्रामीण पुनर्जीवन का माध्यम बन सकती है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती लगातार अलाभकारी होती गई है। इसका एक बड़ा कारण बिखरी हुई भूमि है। एक किसान की जमीन कई स्थानों पर छोटे हिस्सों में फैली होती है, जिससे खेती की लागत बढ़ती है और उत्पादकता घटती है। सिंचाई, सड़क, मशीनरी और आधुनिक कृषि तकनीकों का लाभ भी ऐसे क्षेत्रों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पाता। परिणामस्वरूप ग्रामीण पलायन तेज हुआ और खेत बंजर होने लगे।
सरकार की नई नीति में यदि गांव स्वयं चकबंदी के लिए सहमत होते हैं, तो उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सड़क, पेयजल, कृषि अवसंरचना और अन्य विकास योजनाओं से जोड़ा जाएगा। यह मॉडल “भूमि सुधार + विकास पैकेज” की दिशा में एक प्रयोग माना जा सकता है। यदि इसे पारदर्शी और स्थानीय सहभागिता के साथ लागू किया गया, तो इससे गांवों की आर्थिक संरचना बदल सकती है।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
चकबंदी केवल प्रशासनिक आदेश से सफल नहीं होती। यह सामाजिक विश्वास, पारिवारिक सहमति और पारदर्शी भूमि अभिलेखों पर निर्भर करती है। पहाड़ में भूमि केवल संपत्ति नहीं, बल्कि भावनात्मक और पारिवारिक पहचान का विषय भी है। ऐसे में विवाद, आपत्तियां और स्थानीय राजनीति इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।
दूसरा बड़ा प्रश्न है—क्या सरकार के पास पर्याप्त तकनीकी और राजस्व स्टाफ है? पहले से ही राजस्व विभाग कर्मचारियों की कमी, लंबित मामलों और डिजिटल रिकॉर्ड की समस्याओं से जूझ रहा है। यदि नीति केवल घोषणाओं तक सीमित रही और जमीनी अमला मजबूत नहीं किया गया, तो यह भी कई योजनाओं की तरह फाइलों में सिमट सकती है।
तीसरी चिंता यह है कि चकबंदी के बाद क्या किसानों को बाजार, मूल्य और उत्पादन सुरक्षा भी मिलेगी? केवल जमीन को व्यवस्थित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ कृषि विपणन, प्रसंस्करण, भंडारण, जैविक खेती और स्थानीय उत्पाद आधारित उद्योगों को भी जोड़ना होगा।
फिर भी, यह पहल उत्तराखंड के लिए एक अवसर है। यदि सरकार गांवों को केवल “सब्सिडी” नहीं बल्कि “आर्थिक इकाई” के रूप में विकसित करने की सोच के साथ आगे बढ़े, तो चकबंदी पहाड़ में खेती, रोजगार और जनसंख्या संतुलन की नई शुरुआत बन सकती है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि यह योजना सरकारी विज्ञप्तियों से निकलकर गांव की जमीन तक कितनी ईमानदारी और दक्षता से पहुंचती है।
