जनता की सरकार या सत्ता की सरकार?
(संपादकीय)
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत स्पष्ट है—जनता मालिक है और सरकार सेवक। संविधान इसी भावना पर खड़ा है कि सत्ता का हर निर्णय जनता के हित, अधिकार और गरिमा की रक्षा के लिए हो। लेकिन आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या जनता की सरकार, जनता को ही उसके भूमि अधिकारों और प्राथमिक आवश्यकताओं से वंचित रख सकती है?
संवैधानिक दृष्टि से उत्तर एक शब्द में है—नहीं।
लेकिन व्यवहार में यही “नहीं” अक्सर नीति, प्रक्रिया और विकास के नाम पर “हाँ” में बदल दी जाती है।
भूमि केवल कागज़ का टुकड़ा नहीं है। यह किसान की आजीविका, आदिवासी की पहचान, पहाड़ के निवासी का अस्तित्व और आम नागरिक की सामाजिक सुरक्षा है। जब बिना वास्तविक सहमति के भूमि अधिग्रहण होता है, जब मुआवजा अपर्याप्त होता है और पुनर्वास केवल फाइलों तक सीमित रह जाता है, तब यह विकास नहीं बल्कि विस्थापन का वैधानिक आवरण बन जाता है।
इसी तरह रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी—ये किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि जनता के मौलिक अधिकार हैं। सरकार का दायित्व है कि वह इन्हें सुनिश्चित करे। जब नागरिक को इलाज, शिक्षा या आवास के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि नीतिगत संवेदनहीनता का प्रमाण होता है।
चिंता की बात यह है कि आज नीतियाँ अक्सर जनता के बजाय पूंजी और प्रभावशाली वर्गों के हित में बनती दिखाई देती हैं। सत्ता और कॉर्पोरेट गठजोड़, कमजोर वर्गों की आवाज़ को हाशिये पर धकेल देता है। कानून सबके लिए समान होने के बजाय, कई बार चयनात्मक हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र, लोक-कल्याण से फिसलकर लोक-नियंत्रण की दिशा में बढ़ने लगता है।
परंतु लोकतंत्र में जनता असहाय नहीं है। संविधान उसे प्रश्न पूछने, विरोध करने, न्यायालय जाने और सरकार बदलने का अधिकार देता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब जनता संगठित हुई है, सत्ता को झुकना पड़ा है। चुप्पी ही वह खाद है, जिसमें निरंकुशता पनपती है।
अंततः यह याद रखना होगा कि जो सरकार जनता की भूमि, अधिकार और मूल आवश्यकताओं की रक्षा नहीं कर सकती, वह जनता की सरकार कहलाने का नैतिक अधिकार खो देती है। लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है, वह निरंतर उत्तरदायित्व और जवाबदेही की मांग करता है।
जनता को यह तय करना होगा कि वह केवल मतदाता बनकर रहेगी या वास्तव में उस सत्ता की मालिक बनेगी, जिसके नाम पर शासन किया जा रहा है।
