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सीमा पर सतर्कता जरूरी, लेकिन व्यापार में अवसर तलाशना भी उतना ही जरूरी

चीन आज केवल दुनिया की फैक्ट्री नहीं है, वह तेजी से तकनीक, विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और वैश्विक व्यापार की महाशक्ति बन चुका है। उसकी ताकत अचानक पैदा नहीं हुई। इसके पीछे चार दशकों की ऐसी आर्थिक रणनीति है, जिसमें विनिर्माण, निर्यात, बुनियादी ढांचा, कौशल, अनुसंधान और वैश्विक सप्लाई चेन को लगातार मजबूत किया गया।

भारत के लिए चीन का उभार एक चुनौती भी है और एक अवसर भी।

भारत को यह तय करना होगा कि वह चीन को केवल प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखेगा या एक ऐसे पड़ोसी के रूप में भी, जिसके साथ राष्ट्रीय हितों की सीमाओं के भीतर आर्थिक संबंधों को मजबूत किया जा सकता है।

चीन से सबसे बड़ा सबक क्या है?

चीन ने दुनिया को यह दिखाया है कि केवल बड़ी आबादी किसी देश को आर्थिक महाशक्ति नहीं बनाती। आबादी को उत्पादन शक्ति में बदलना पड़ता है।

चीन ने गांवों और छोटे शहरों तक उद्योग पहुंचाए। बंदरगाहों से लेकर एक्सप्रेसवे और हाई-स्पीड रेल तक बुनियादी ढांचे का विशाल नेटवर्क बनाया। एक कारखाने के आसपास उसके पुर्जे बनाने वाली सैकड़ों कंपनियां खड़ी कीं। परिणाम यह हुआ कि चीन में उत्पादन केवल सस्ता नहीं रहा, बल्कि तेज और बड़े पैमाने पर संभव हुआ।

आज चीन इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, ड्रोन, रोबोटिक्स और अनेक उच्च तकनीकी क्षेत्रों में दुनिया के प्रमुख खिलाड़ियों में है।

भारत को इसका उत्तर केवल चीनी सामान के बहिष्कार से नहीं देना चाहिए।

बहिष्कार से बाजार खाली हो सकता है, लेकिन उद्योग नहीं बनता।

उद्योग बनाने के लिए कारखाना, तकनीक, पूंजी, कुशल श्रमिक, कच्चा माल, बिजली, लॉजिस्टिक्स और बाजार—पूरी व्यवस्था चाहिए।

भारत की चीन नीति कैसी हो?

भारत की नीति का आधार होना चाहिए—

“सीमा पर सतर्कता, व्यापार में समझदारी और रणनीति में आत्मनिर्भरता।”

भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करना चाहिए। सीमा विवाद, सैन्य सुरक्षा और संवेदनशील तकनीक जैसे विषयों पर स्पष्ट और कठोर नीति आवश्यक है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर आर्थिक संबंध को भी दुश्मनी की कसौटी पर कस दिया जाए।

दुनिया की अर्थव्यवस्था में पड़ोसी देशों के बीच व्यापार स्वाभाविक है। भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध भी इसी वास्तविकता का हिस्सा हैं।

सवाल यह नहीं होना चाहिए कि चीन से व्यापार हो या नहीं।

सवाल यह होना चाहिए कि—

भारत चीन से क्या खरीदे, क्या भारत में बनाए और चीन को क्या बेचे?

चीन से आयात को अवसर में बदलिए

भारत को चीनी कंपनियों से केवल तैयार माल खरीदने के बजाय उन्हें भारत में उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

नीति साफ हो सकती है—

“भारतीय बाजार चाहिए तो भारत में निर्माण कीजिए।”

जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न न हो, वहां नियंत्रित और पारदर्शी तरीके से निवेश, संयुक्त उपक्रम, तकनीकी सहयोग और स्थानीय manufacturing को बढ़ावा दिया जा सकता है।

इससे चीन से आने वाला पैसा केवल भारतीय बाजार में सामान बेचने के बजाय भारतीय रोजगार और उत्पादन क्षमता बनाने में भी लगेगा।

यही China+1 strategy का वास्तविक भारतीय संस्करण हो सकता है।

व्यापार घाटे को केवल राष्ट्रवाद का मुद्दा न बनाएं

भारत और चीन के बीच व्यापार असंतुलन निश्चित रूप से चिंता का विषय है। लेकिन व्यापार घाटे का समाधान केवल आयात रोकना नहीं है।

यदि भारत चीन से 100 रुपये का सामान खरीदता है तो लक्ष्य यह होना चाहिए कि भविष्य में भारत चीन को 100 रुपये या उससे अधिक का सामान और सेवाएं बेच सके।

भारत के पास pharmaceuticals, chemicals, engineering goods, कृषि उत्पाद, food processing, software और services जैसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां निर्यात की संभावनाएं बढ़ाई जा सकती हैं।

इसके साथ ही भारत को अपने हिमालयी उत्पादों, आयुर्वेद, योग, wellness, प्राकृतिक खाद्य और कृषि उत्पादों को भी वैश्विक बाजार से जोड़ना चाहिए।

उत्तराखंड जैसे राज्य इस दिशा में छोटे लेकिन महत्वपूर्ण प्रयोग कर सकते हैं।

चीन से प्रतिस्पर्धा करनी है तो भारत को उत्पादन करना होगा

भारत की सबसे बड़ी कमजोरी अभी भी कई क्षेत्रों में manufacturing ecosystem का अधूरा होना है।

हमें केवल अंतिम उत्पाद बनाने वाली फैक्ट्रियां नहीं चाहिएं।

हमें चाहिए—

कच्चा माल → कंपोनेंट → मशीनरी → फैक्ट्री → कुशल श्रमिक → लॉजिस्टिक्स → बंदरगाह → निर्यात।

जब यह पूरी श्रृंखला भारत में बनेगी, तभी भारत चीन से वास्तविक आर्थिक प्रतिस्पर्धा कर पाएगा।

भारत का लोकतंत्र उसकी कमजोरी नहीं, उसकी ताकत भी बन सकता है—यदि नीति में स्थिरता, कानून में भरोसा और कारोबार में सरलता सुनिश्चित की जाए।

भारत-चीन संबंधों को शून्य-योग खेल न बनाएं

भारत और चीन दोनों एशिया की बड़ी सभ्यताएं हैं और दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी हैं। इसलिए दोनों देशों के बीच स्थायी तनाव किसी के हित में नहीं है।

भारत को न तो चीन की हर नीति का समर्थन करना चाहिए और न ही हर चीनी पहल को संदेह की नजर से देखना चाहिए।

जहां सुरक्षा का सवाल है वहां सावधानी, जहां व्यापार का अवसर है वहां बातचीत और जहां राष्ट्रीय हित है वहां स्पष्टता—यही व्यावहारिक नीति हो सकती है।

भारत को अमेरिका, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया, ASEAN और अन्य देशों के साथ संबंध मजबूत करते हुए चीन के साथ भी आर्थिक संवाद बनाए रखना चाहिए।

अर्थात भारत की विदेश नीति का आधार किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन नहीं, बल्कि भारतीय हितों के पक्ष में बहु-दिशात्मक साझेदारी होना चाहिए।

चीन से सीखें, चीन की नकल नहीं करें

भारत को चीन की राजनीतिक व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन चीन की आर्थिक रणनीति से सीखने में कोई हर्ज नहीं—

दीर्घकालीन योजना, manufacturing, infrastructure, R&D, skill development, supply chain और export orientation।

भारत इन ताकतों के साथ अपनी विशेष शक्तियां जोड़ सकता है—

लोकतंत्र, युवा आबादी, उद्यमिता, विशाल घरेलू बाजार, सेवाक्षेत्र और दुनिया के साथ जुड़ने की क्षमता।

भारत को चीन से डरने की नहीं, चीन को समझने की जरूरत है।

क्योंकि आने वाले वर्षों में भारत और चीन केवल दो पड़ोसी देश नहीं होंगे; वे एशिया और विश्व अर्थव्यवस्था के भविष्य को प्रभावित करने वाली दो बड़ी शक्तियां होंगे।

इसलिए नीति का मंत्र स्पष्ट होना चाहिए—

न अंधी दोस्ती, न स्थायी दुश्मनी।
सीमा पर राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यापार में राष्ट्रीय हित और संबंधों में पड़ोसी धर्म।

भारत का लक्ष्य चीन को हराना नहीं, भारत को इतना मजबूत बनाना होना चाहिए कि वह चीन के साथ बराबरी की स्थिति में बातचीत कर सके।

यही सच्ची आत्मनिर्भरता है।

— संपादकीय


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By udaen

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