संपादकीय |
द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी तानाशाही के पतन और हिटलर के अंत के आठ दशक बाद जर्मनी एक बार फिर ऐसे राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है, जहां इतिहास वर्तमान से सवाल पूछ रहा है। पूर्वी जर्मनी के सैक्सोनी-आनहाल्ट राज्य में दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) का जबरदस्त चुनावी उभार केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि यूरोप की बदलती राजनीतिक चेतना का संकेत है।
AfD ने राज्य विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरकर जर्मनी की उस राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दी है, जिसने 1945 के बाद नाजी विचारधारा की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर एक मजबूत राजनीतिक दीवार खड़ी की थी। सवाल यह नहीं है कि जर्मनी में हिटलर लौट आया है। इतिहास इतनी आसानी से दोहराया नहीं जाता। सवाल यह है कि क्या वे परिस्थितियां फिर पैदा हो रही हैं, जिनमें कट्टर राष्ट्रवाद, प्रवासी-विरोध और व्यवस्था से असंतोष राजनीति का प्रमुख आधार बनने लगते हैं?
AfD का बढ़ता प्रभाव जर्मन समाज में मौजूद असंतोष को भी सामने लाता है। महंगाई, रोजगार, प्रवासन, सुरक्षा, आर्थिक असमानता और पारंपरिक राजनीतिक दलों से बढ़ती निराशा ने जनता के एक हिस्से को ऐसी राजनीति की ओर मोड़ा है, जो समस्याओं के सरल और कठोर समाधान का वादा करती है।
यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है।
जब व्यवस्था लोगों की वास्तविक चिंताओं का समाधान नहीं कर पाती, तब कट्टरपंथी राजनीति उन चिंताओं को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने लगती है। प्रवासी समस्या हो या बेरोजगारी, आर्थिक असुरक्षा हो या सांस्कृतिक पहचान—इन मुद्दों पर गंभीर नीति बनाने के बजाय यदि राजनीति भय और विभाजन को अपना हथियार बना ले, तो लोकतंत्र का सामाजिक आधार कमजोर होने लगता है।
जर्मनी के इतिहास में इसका परिणाम दुनिया देख चुकी है।
इसलिए जर्मन समाज में “Never Again” की आवाज केवल अतीत की याद नहीं है। यह लोकतंत्र के प्रति एक चेतावनी भी है। लेकिन दूसरी ओर लोकतांत्रिक दलों को भी यह समझना होगा कि केवल दक्षिणपंथ के विरोध में नारे लगाने से जनता का असंतोष समाप्त नहीं होगा। जनता को रोजगार, सुरक्षा, बेहतर जीवन, प्रभावी शासन और भविष्य का भरोसा चाहिए।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वह असहमति को जगह देता है। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा केवल संस्थाओं से नहीं होती; उसकी रक्षा समाज की उस चेतना से होती है जो यह पहचान सके कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रहित में अंतर है, असहमति और घृणा में अंतर है तथा प्रवासन की समस्या और किसी पूरे समुदाय को दोषी ठहराने में अंतर है।
जर्मनी आज एक निर्णायक मोड़ पर है। उसे अपने अतीत से डरने की नहीं, उससे सीखने की जरूरत है।
क्योंकि इतिहास कभी हूबहू वापस नहीं आता।
वह नए नारों, नए चेहरों और नई परिस्थितियों के साथ लौट सकता है।
और इसलिए जर्मनी के लिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या वह अपने अतीत की गलतियों को दोहराएगा, या लोकतंत्र को इतना मजबूत करेगा कि असंतोष का जवाब कट्टरता नहीं, बल्कि बेहतर शासन बने?
