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संपादकीय | घर की तिजोरी से अर्थव्यवस्था तक—सोने का नया अर्थशास्त्र

भारत में सोना केवल एक धातु नहीं है। यह भारतीय परिवारों की बचत, सुरक्षा, परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा रहा है। शादी-ब्याह से लेकर कठिन समय तक, सोना अक्सर परिवार की सबसे भरोसेमंद संपत्ति माना जाता है। लेकिन यही सोना जब वर्षों तक लॉकरों और तिजोरियों में निष्क्रिय पड़ा रहता है, तो अर्थव्यवस्था के लिए उसका बड़ा हिस्सा उपयोग से बाहर हो जाता है।

इसी सोच से Gold Monetisation Scheme लाई गई थी। इसका मूल विचार सरल है—यदि परिवारों के पास ऐसा सोना है जिसे वे लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं करने वाले हैं, तो उसे बैंकिंग व्यवस्था में जमा कराकर उस पर ब्याज कमाया जा सकता है। इससे व्यक्ति को निष्क्रिय संपत्ति से आय मिल सकती है और देश को सोने के आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।

लेकिन आज इस योजना को नए संदर्भ में देखने की जरूरत है। सरकार ने 2025 में इसके Medium और Long Term Government Gold Deposit विकल्प बंद कर दिए हैं और अब मुख्य रूप से Short-Term Bank Deposit का विकल्प उपलब्ध है। इसका अर्थ यह है कि Gold Monetisation को अब केवल सरकारी योजना के रूप में नहीं, बल्कि बैंकिंग और व्यक्तिगत वित्त के एक सीमित विकल्प के रूप में समझना चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल विश्वास का है। भारतीय परिवार अपना सोना केवल उसकी बाजार कीमत के कारण नहीं रखते। उसके साथ भावनात्मक और पारिवारिक जुड़ाव भी होता है। इसलिए किसी व्यक्ति को अपना पारंपरिक आभूषण बैंक में जमा करने के लिए केवल ब्याज दर बताना पर्याप्त नहीं है। उसे यह स्पष्ट भरोसा चाहिए कि मूल्यांकन पारदर्शी होगा, शुल्क क्या होंगे, परिपक्वता पर भुगतान कैसे होगा और निकासी की पूरी प्रक्रिया क्या होगी।

दूसरा सवाल है—क्या हर सोने को Monetise करना चाहिए? इसका उत्तर नहीं है। पुश्तैनी आभूषण, शादी के गहने या भावनात्मक महत्व वाली वस्तुएं केवल निवेश नहीं हैं। उन्हें पिघलाकर बैंकिंग प्रणाली में डालना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हो सकता है, लेकिन सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से जरूरी नहीं।

वहीं दूसरी ओर, वर्षों से बिना इस्तेमाल पड़ा बार, सिक्का या ऐसा सोना जिसे परिवार बेचने या इस्तेमाल करने वाला नहीं है, उसके लिए Gold Monetisation एक विकल्प हो सकता है। लेकिन निर्णय लेने से पहले ब्याज, शुद्धता परीक्षण, शुल्क, लॉक-इन अवधि, कर प्रभाव और बैंक की शर्तों को समझना जरूरी है।

भारत की अर्थव्यवस्था में सोने का महत्व देखते हुए सरकार को भी केवल योजना घोषित करने से आगे बढ़ना होगा। पारदर्शिता, सरल प्रक्रिया, बेहतर जागरूकता और ग्राहक संरक्षण इस व्यवस्था की सफलता की कुंजी हैं।

आखिरकार सवाल यह नहीं कि भारतीय घरों में कितना सोना है। सवाल यह है कि उस सोने का कितना हिस्सा केवल तिजोरी में बंद है और कितना भारतीय अर्थव्यवस्था की उत्पादक शक्ति बन सकता है।

सोना यदि घर की सुरक्षा है तो उसे बैंकिंग व्यवस्था में लाने का फैसला भी सुरक्षा, विश्वास और आर्थिक लाभ—तीनों के संतुलन पर आधारित होना चाहिए। यही Gold Monetisation की असली परीक्षा है।


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By udaen

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