संपादकीय | न्याय केवल इंसानों के लिए नहीं
बेगुनाह गुलदार की मौत: जवाबदेही से कब तक बचता रहेगा तंत्र?
उत्तराखंड के गढ़वाल वन प्रभाग की धुमाकोट रेंज में पिंजरे में कैद एक गुलदार की मृत्यु ने वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मीडिया में आई जानकारी के अनुसार, जिस गुलदार को एक महिला की मौत के मामले में संदेह के आधार पर पकड़ा गया था, उसके डीएनए नमूने घटना से मेल नहीं खाए। यदि यह तथ्य आधिकारिक जांच में सही सिद्ध होता है, तो यह केवल एक वन्यजीव की मौत नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामलों में वन विभाग पर त्वरित कार्रवाई का दबाव होता है। लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और ऐसे मामलों में संदिग्ध वन्यजीव को पकड़ना परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक भी हो सकता है। लेकिन किसी भी कार्रवाई का आधार वैज्ञानिक जांच और कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए। यदि जांच में संदेह समाप्त हो जाए, तो संबंधित वन्यजीव के भविष्य पर समयबद्ध और वैज्ञानिक निर्णय लेना भी विभाग की जिम्मेदारी है।
यदि वास्तव में एक निर्दोष गुलदार 22 दिनों तक पिंजरे में बंद रहा और उसी दौरान उसकी मृत्यु हो गई, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि वन्यजीव कल्याण की भावना के भी विपरीत है। अब यह जानना आवश्यक है कि निर्णय लेने में देरी क्यों हुई? क्या निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन किया गया? क्या उसकी नियमित स्वास्थ्य जांच और चिकित्सकीय देखभाल हुई? इन सभी प्रश्नों के उत्तर एक स्वतंत्र और पारदर्शी जांच से ही मिल सकते हैं।
यह घटना एक व्यापक सुधार की भी मांग करती है। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में केवल वन्यजीवों को पकड़ना समाधान नहीं है। वैज्ञानिक निगरानी, आधुनिक रेस्क्यू सेंटर, डीएनए जांच की त्वरित प्रक्रिया और स्पष्ट समय-सीमा के साथ निर्णय लेने की व्यवस्था विकसित करना अनिवार्य है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जांच पूरी होने से पहले किसी अधिकारी को दोषी घोषित करने के बजाय तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाए। लेकिन यदि जांच में लापरवाही सिद्ध होती है, तो कार्रवाई भी उतनी ही सख्त होनी चाहिए जितनी किसी अन्य नागरिक के मामले में होती।
वन्यजीव बोल नहीं सकते, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत नहीं जा सकते और न ही अपनी पीड़ा व्यक्त कर सकते हैं। इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा करना राज्य और समाज दोनों का दायित्व है।
इस घटना की निष्पक्ष जांच केवल एक गुलदार को न्याय दिलाने का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह तय करने का भी अवसर है कि क्या हमारी वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था वास्तव में संवेदनशील, वैज्ञानिक और जवाबदेह है।
— संपादकीय, उड़ान न्यूज़ नेटवर्क (Udaen News Network)
