साल के जंगलों पर दोहरा खतरा: ‘हॉप्लो’ संक्रमण और नीतिगत असंतुलन
उत्तराखंड के देहरादून वन प्रभाग में 19,000 से अधिक साल के पेड़ों को काटने का प्रस्ताव केवल एक वन प्रबंधन निर्णय नहीं, बल्कि पर्यावरणीय नीति, वैज्ञानिक समझ और शासन की प्राथमिकताओं की परीक्षा है। राज्य सरकार द्वारा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से अनुमति मांगना इस बात का संकेत है कि समस्या गंभीर है—लेकिन समाधान की दिशा पर गंभीर प्रश्न भी उतने ही बड़े हैं।
देहरादून स्थित Forest Research Institute (FRI) के विशेषज्ञों ने ‘हॉप्लो’ नामक कीट के लार्वा द्वारा साल के पेड़ों को भीतर से खोखला कर देने की पुष्टि की है। कई पेड़ पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे उनकी कटाई अपरिहार्य प्रतीत होती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या 19,000 पेड़ों की सामूहिक कटाई ही एकमात्र विकल्प है, या यह एक जल्दबाज़ी में लिया गया निर्णय हो सकता है?
इतिहास बताता है कि 1990 के दशक में भी इसी तरह का संक्रमण थानो रेंज में देखा गया था। तब अपनाए गए उपायों का मूल्यांकन आज के संदर्भ में बेहद जरूरी है। क्या हमने उस अनुभव से कोई सीख ली? या हर संकट के समाधान में ‘कटाई’ ही पहला और अंतिम उपाय बनता जा रहा है?
‘Tree Trap Operation’ जैसी तकनीकें, जिनमें कुछ पेड़ों को काटकर कीटों को आकर्षित कर नष्ट किया जाता है, एक पारंपरिक और सीमित प्रभाव वाली विधि है। इसे बड़े पैमाने पर लागू करना अपने आप में एक पारिस्थितिक हस्तक्षेप है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। विशेषकर तब, जब यह प्रक्रिया स्वस्थ पेड़ों की बलि लेकर की जाती है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—पारिस्थितिक संतुलन। ‘हॉप्लो’ कीट केवल एक विनाशकारी तत्व नहीं, बल्कि खाद्य श्रृंखला का हिस्सा भी है। कठफोड़वा जैसे पक्षी इन्हीं कीटों पर निर्भर करते हैं। यदि हम इस कीट को पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में बढ़ते हैं, तो क्या हम अनजाने में एक और असंतुलन को जन्म नहीं देंगे?
इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन का पहलू इस संकट को और जटिल बनाता है। पिछले वर्ष उत्तराखंड में असामान्य वर्षा दर्ज की गई, जिसे विशेषज्ञ ‘हॉप्लो’ संक्रमण के विस्तार का एक संभावित कारण मानते हैं। यदि यह सही है, तो यह समस्या केवल एक कीट की नहीं, बल्कि बदलते पर्यावरणीय पैटर्न की है। ऐसे में समाधान भी केवल स्थानीय नहीं, बल्कि व्यापक जलवायु रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पूरे निर्णय में स्थानीय समुदायों, विशेषकर वन आश्रित लोगों की भूमिका और दृष्टिकोण लगभग अनुपस्थित है। क्या उन्हें केवल ‘श्रम’ के रूप में देखा जाएगा—जैसे कि ‘Tree Trap Operation’ में महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी—या उन्हें नीति निर्माण में भी स्थान मिलेगा?
सरकार के सामने चुनौती स्पष्ट है: क्या वह तात्कालिक समाधान के नाम पर एक स्थायी क्षति का जोखिम उठाएगी, या वैज्ञानिक अनुसंधान, सामुदायिक सहभागिता और पारिस्थितिक संतुलन के आधार पर एक दीर्घकालिक रणनीति विकसित करेगी?
साल के जंगल उत्तराखंड की जैव विविधता, जल स्रोतों और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि इन पर संकट है, तो यह केवल वन विभाग का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे राज्य के भविष्य का प्रश्न है। ऐसे में हर निर्णय—विशेषकर पेड़ों की सामूहिक कटाई जैसा कदम—सावधानी, पारदर्शिता और वैज्ञानिक आधार पर ही लिया जाना चाहिए।
अन्यथा, ‘हॉप्लो’ से बचाने के प्रयास में हम अपने ही जंगलों को एक बड़े, और शायद अपूरणीय, संकट की ओर धकेल सकते हैं।
