Spread the love


📰 संपादकीय | धरोहर बची तो पहचान बचेगी

उत्तराखंड केवल एक भौगोलिक राज्य नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था, प्रकृति और संस्कृति की जीवित धरोहर है। यहाँ के प्राचीन मंदिर, किले, नौले-धारे, वन और लोक परंपराएँ सदियों से हमारी पहचान रहे हैं। लेकिन आज यही धरोहरें उपेक्षा, अवैज्ञानिक विकास और सरकारी उदासीनता की शिकार होती जा रही हैं।

केदारनाथ, बद्रीनाथ, जागेश्वर, बैजनाथ जैसे धार्मिक स्थल हों या फिर नौले, चाल-खाल और पारंपरिक गाँव—सब पर अंधाधुंध निर्माण, बढ़ते पर्यटन दबाव और माफिया संस्कृति का असर साफ दिखाई देता है। विकास के नाम पर धरोहरों को नुकसान पहुँचाना दरअसल भविष्य से विश्वासघात है।

चिंताजनक तथ्य यह है कि उत्तराखंड में सैकड़ों ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल ऐसे हैं जो न तो ASI द्वारा संरक्षित हैं और न ही राज्य सरकार की स्पष्ट सूची में। कई स्थलों पर अवैध निर्माण हो चुके हैं, कहीं खुदाई और तोड़फोड़ जारी है, तो कहीं प्रशासनिक फाइलों में धरोहरें सिर्फ़ नाम मात्र की रह गई हैं।

राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित हेरिटेज एक्ट वर्षों से चर्चा में है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसके ठोस परिणाम दिखाई नहीं देते। जब तक कानून केवल काग़ज़ों में रहेगा, तब तक धरोहरों का संरक्षण एक खोखला दावा ही रहेगा।

धरोहरों की रक्षा सिर्फ़ सरकार की नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। स्थानीय समुदाय, पंचायतें, युवा, पत्रकार और बुद्धिजीवी—सभी को आगे आना होगा। जिस तरह लोग जंगल और पानी के लिए आवाज़ उठाते हैं, उसी तरह संस्कृति और इतिहास के लिए भी संघर्ष ज़रूरी है।

यह भी समझना होगा कि धरोहर संरक्षण विकास का विरोध नहीं है, बल्कि सतत और संवेदनशील विकास का आधार है। जो राज्य अपनी जड़ों को काट देता है, वह लंबे समय तक खड़ा नहीं रह सकता।

आज ज़रूरत है—

  • स्पष्ट हेरिटेज नीति
  • जिले-वार धरोहर स्थलों की सार्वजनिक सूची
  • अवैध निर्माण पर सख़्त कार्रवाई
  • स्थानीय लोगों की भागीदारी से संरक्षण मॉडल

अगर आज भी हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ उत्तराखंड को सिर्फ़ तस्वीरों और किताबों में देखेंगी।
धरोहर बचेगी, तभी उत्तराखंड बचेगा।



Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *