Spread the love

संपादकीय

लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है। चुनाव उस भरोसे का नाम है जिसमें मतदाता यह विश्वास करता है कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है, उसका वोट दर्ज होगा और चुनाव कराने वाली संस्था निष्पक्ष तथा पारदर्शी तरीके से अपना दायित्व निभाएगी।

इसीलिए चुनाव आयोग के भीतर सामने आए हालिया मतभेदों को केवल आयोग का आंतरिक विवाद मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है।

द इंडियन एक्सप्रेस की 25 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 मौकों पर मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, मतदाता डेटा तक पहुंच तथा चुनावी सूचना-प्रौद्योगिकी व्यवस्था से जुड़े निर्णयों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने कुछ निर्णयों को उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। चुनाव आयोग ने कहा है कि महत्वपूर्ण निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए और 26 सितंबर की बैठक के बाद आयोग ने भविष्य की बैठकों में एजेंडा पहले साझा करने तथा कार्यवृत्त जारी करने जैसे कदमों की घोषणा की।

इसलिए इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कौन सही है और कौन गलत।

सवाल यह होना चाहिए कि क्या चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली इतनी पारदर्शी है कि नागरिक स्वयं उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर अपना निष्कर्ष निकाल सके?

यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

पंच की कुर्सी से चुनाव आयोग तक

गांव की पंचायत में पंच की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अगर इस डर से सच बोलना छोड़ दे कि किसी से बिगाड़ हो जाएगा, तो वह न्याय करने की अपनी भूमिका कमजोर कर देता है।

संवैधानिक संस्थाओं में जिम्मेदारी उससे कहीं बड़ी होती है।

चुनाव आयोग के भीतर असहमति होना अपने आप में लोकतंत्र-विरोधी नहीं है। बल्कि गंभीर संस्थागत प्रश्नों पर असहमति को दर्ज करने और उसका परीक्षण करने की व्यवस्था लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा हो सकती है। 2023 के कानून में आयोग के कामकाज को यथासंभव सर्वसम्मति से चलाने और मतभेद होने पर बहुमत से निर्णय का प्रावधान है।

लेकिन इसके साथ एक दूसरी जिम्मेदारी भी जुड़ती है—असहमति हो तो उसका तथ्यात्मक आधार स्पष्ट हो और अंतिम निर्णय की प्रक्रिया भी रिकॉर्ड में साफ दिखाई दे।

जनता को न तो आरोपों के आधार पर फैसला सुनाना चाहिए और न ही किसी संस्था के स्पष्टीकरण को सवालों से परे मान लेना चाहिए।

उत्तराखंड के लिए यह सवाल और महत्वपूर्ण क्यों है?

उत्तराखंड 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ 19 फरवरी से 8 सितंबर तक कई बैठकें दर्ज हैं।

इसका सीधा अर्थ है कि मतदाता सूची से जुड़े सवाल उत्तराखंड में भी केवल भविष्य की चर्चा नहीं हैं; प्रक्रिया अभी से महत्वपूर्ण है।

उत्तराखंड जैसे राज्य में यह विषय इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यहां पहाड़ से मैदान तक बड़ी संख्या में लोगों का आवागमन, अस्थायी निवास, रोजगार के लिए पलायन और अलग-अलग स्थानों पर मतदाता पंजीकरण जैसी व्यावहारिक परिस्थितियां हैं।

ऐसे में किसी मतदाता का नाम सूची में जोड़ना, हटाना या पुनः शामिल करना केवल आंकड़ों का फेरबदल नहीं है। यह सीधे उसके मताधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

इसलिए 2027 के चुनाव से पहले उत्तराखंड के प्रत्येक मतदाता के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश होना चाहिए—

अपना नाम मतदाता सूची में जांचिए।
गलती हो तो समय रहते आपत्ति दर्ज कीजिए।
और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े हर निर्णय को राजनीतिक चश्मे के बजाय संवैधानिक अधिकार के नजरिए से देखिए।

चुनाव आयोग को क्या करना चाहिए?

इस समय जनता को आश्वासन से ज्यादा स्पष्टता चाहिए।

मतदाता सूची में कितने नाम जोड़े गए?
कितने हटाए गए?
किस आधार पर हटाए गए?
कितने मामलों में आपत्तियां आईं?
कितने नाम पुनः जोड़े गए?
किस स्तर पर निर्णय हुआ?
और डिजिटल प्रणाली में किस अधिकारी की क्या भूमिका है?

इन सवालों के जवाब जितने स्पष्ट होंगे, चुनाव आयोग पर भरोसा उतना मजबूत होगा।

उत्तराखंड के राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे मतदाता सूची से जुड़े वास्तविक मामलों को दस्तावेज और प्रमाण के साथ उठाएं। किसी मतदाता का नाम हटना यदि गलती है तो उसे सुधरवाना जरूरी है; लेकिन हर प्रशासनिक त्रुटि को राजनीतिक आरोप में बदल देना भी समाधान नहीं है।

और मीडिया की जिम्मेदारी शायद सबसे बड़ी है—न आरोप को फैसला बनाना, न सरकारी स्पष्टीकरण को अंतिम सत्य।

लोकतंत्र में कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी बड़ी होती है

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता किसी एक व्यक्ति से नहीं बनती। यह संस्था, कानून, प्रक्रिया, अधिकारियों और अंततः मतदाता के विश्वास से बनती है।

इसलिए आज का सवाल किसी एक चुनाव आयुक्त का नहीं है। सवाल यह है कि भारत की चुनाव व्यवस्था ऐसी हो जिसमें सवाल पूछने की जगह हो, असहमति दर्ज करने की जगह हो, निर्णयों का रिकॉर्ड हो और नागरिक को तथ्य जानने का अवसर मिले।

उत्तराखंड 2027 में चुनाव की ओर बढ़ रहा है। राजनीतिक दल अपनी तैयारियां कर रहे हैं और चुनावी प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। ऐसे समय में मतदाता को किसी राजनीतिक प्रचार से अधिक जरूरत है—विश्वसनीय मतदाता सूची और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया की।

पंच की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अगर बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहना बंद कर दे तो पंचायत का भरोसा टूटता है।

और अगर संवैधानिक संस्था में सवाल उठें, लेकिन उनके जवाब पारदर्शी तरीके से सामने न आएं, तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण आधार—जनता का विश्वास—कमजोर पड़ सकता है।

इसलिए आज जरूरत किसी के पक्ष में खड़े होने की नहीं है।

जरूरत है कि संस्था इतनी पारदर्शी हो कि जनता को किसी पक्ष में खड़े होने की जरूरत ही न पड़े।

कुर्सी की गरिमा चुप्पी से नहीं,
ईमानदार जवाबदेही से बचती है।

और लोकतंत्र में आखिर सवाल यही रहेगा—

बिगाड़ के डर से अगर ईमान की बात भी बंद हो जाए, तो फिर सच बोलेगा कौन?


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *