🔥 संपादकीय : अंगारों की तासीर और जले हुए हाथों की सच्चाई
सच को उठाना कभी आसान नहीं रहा। हर दौर में सच की तासीर अंगारों जैसी ही रही है—छूते ही जलाने वाली, पर अँधेरे में रोशनी देने वाली। जो समाज, सत्ता या व्यवस्था को आईना दिखाता है, वह पहले स्वयं उस आग से गुजरता है। हाथ जलते हैं, उँगलियाँ छिलती हैं, पर अगर यह आग न हो, तो रास्ते भी दिखना बंद हो जाएँ।
आज का समय भी इससे अलग नहीं है। सवाल पूछना, अन्याय की ओर उँगली उठाना या हाशिए की आवाज़ बनना—इन सबकी कीमत चुकानी पड़ती है। व्यवस्था चाहती है कि सच को इतनी गर्मी दे दी जाए कि आम आदमी उसे उठाने से पहले ही डर जाए। यही कारण है कि कई बार सच्चाई राख में बदलती दिखाई देती है और झूठ ठंडे हाथों से तख़्त पर बैठा नजर आता है।
लेकिन इतिहास गवाह है—हर बदलाव की शुरुआत उन्हीं हाथों से हुई है जो जले हुए थे। जिनके पास न सुरक्षा थी, न सुविधा, केवल सवाल थे और उन्हें थामने का साहस था। चुप्पी कभी समाधान नहीं रही; उसने सिर्फ़ अंगारों को भीतर सुलगाया है। जब यह आग बाहर आती है, तो उसे विद्रोह कहा जाता है, जबकि असल में वह चेतना होती है।
विशेषकर पहाड़ी और ग्रामीण समाज में, जहाँ संघर्ष रोज़मर्रा की हकीकत है, सच बोलना और भी कठिन हो जाता है। पलायन, बेरोज़गारी, संसाधनों की लूट—इन सब पर आवाज़ उठाना अक्सर व्यक्तिगत नुकसान का कारण बनता है। फिर भी कुछ लोग हैं जो अंगारों को हथेलियों पर रखकर खड़े रहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि अगर आग बुझ गई, तो अँधेरा स्थायी हो जाएगा।
यह संपादकीय किसी आग को भड़काने का आह्वान नहीं है, बल्कि उस आग की अहमियत समझाने का प्रयास है। सवालों की आग, सच की आग—जो जलाती ज़रूर है, पर समाज को ठंडे झूठ से बचाए रखती है। हमें तय करना होगा कि हम सुरक्षित राख बनकर रहना चाहते हैं या जले हुए हाथों के साथ उजाले की ओर बढ़ना चाहते हैं।
क्योंकि अंततः—
अंगारों की तासीर ही यह तय करती है कि समाज सोया रहेगा या जागेगा।
