**संपादकीय: भैरोंघाटी के देवदार–
हिमालय की साँसें और हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी
गंगोत्री मार्ग पर स्थित शांत और संवेदनशील भैरोंघाटी आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यहाँ 6,500 से अधिक परिपक्व देवदार वृक्षों की कटाई का प्रस्ताव केवल एक सड़क चौड़ीकरण परियोजना का हिस्सा नहीं है, बल्कि हिमालय के पर्यावरणीय भविष्य और हमारी सामूहिक चेतना की परीक्षा भी है। जिस घाटी में कुछ वर्ष पहले अचानक आई भीषण बाढ़ ने नौ भारतीय सैनिकों की जान ले ली थी, वही घाटी आज फिर से एक संभावित आपदा के सामने खड़ी है—इस बार मानवजनित।
ऐसे समय में ‘हिमालय हैं तो हम हैं’ संगठन, स्थानीय महिलाएँ, आरएसएस स्वयंसेवक और पर्यावरणविदों का मौन विरोध हमें एक ऐतिहासिक आंदोलन की याद दिलाता है। 1974 का चिपको आंदोलन केवल पहाड़ की महिलाओं का प्रतिरोध नहीं था, वह एक चेतावनी थी कि हिमालय को केवल संसाधन के रूप में न देखा जाए। आज भैरोंघाटी में रक्षासूत्र बाँधना उसी चेतना का पुनरुत्थान है—यह संदेश कि पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं, बल्कि जीवन के स्तंभ हैं।
यह भी विचारणीय है कि इस आंदोलन को वरिष्ठ राजनेता और भाजपा मार्गदर्शक मंडल के सदस्य डॉ. मुरली मनोहर जोशी का वैचारिक समर्थन मिला है। उम्र भले ही उन्हें जमीनी स्तर पर मौजूद होने से रोकती है, पर वे सोशल मीडिया के माध्यम से इस संघर्ष का मनोबल बढ़ा रहे हैं। यह दुर्लभ और महत्वपूर्ण है कि एक राजनीतिक धारा से जुड़े बड़े नेता सड़क परियोजना पर पर्यावरणीय चेतावनियों को प्राथमिकता देते दिख रहे हैं।
पर्यावरणविद डॉ. ध्यानी और वैज्ञानिक डॉ. ज्यूयाल पहले ही इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन कर सरकार को सलाह दे चुके थे—सड़क का मार्ग ऊँचाई पर बदला जाए, सड़क की चौड़ाई यथासंभव सीमित रखी जाए, और पेड़ों की कटाई न्यूनतम हो। लेकिन उनकी रिपोर्ट और तकनीकी चेतावनियाँ फाइलों में दबी रह गईं। परिणामस्वरूप, आज एक बड़ी संख्या में देवदारों पर कुल्हाड़ी का भय मंडरा रहा है।
सवाल यह है कि क्या विकास केवल चौड़ी सड़कों और तेज़ यातायात से परिभाषित होगा? या फिर हम यह समझ पाएँगे कि हिमालय जैसे नाजुक पारिस्थितिक तंत्र में विकास का पैमाना अलग होना चाहिए?
हिमालय में कटे एक-एक वृक्ष का प्रभाव मैदानों तक जाता है—बाढ़, भूस्खलन, जलस्रोतों का क्षरण, और जलवायु असंतुलन हम सबकी साझा समस्या है, न कि केवल पहाड़ की।
आज जरूरत है कि नीति-निर्माता अपनी परिभाषाओं पर पुनर्विचार करें। विकास और विनाश के बीच की रेखा हिमालय में बेहद पतली है। परियोजनाएँ हों, जरूर हों—लेकिन वैज्ञानिक विवेक, स्थानीय भूगोल और पर्यावरणीय संवेदनशीलता सर्वोपरि रखकर। समाधान मौजूद हैं—वैकल्पिक मार्ग, कम चौड़ाई, सुरंगें, और तकनीकी दृष्टि से सुरक्षित सड़कें। प्रश्न है कि क्या हम उन्हें अपनाने का धैर्य और राजनीतिक इच्छाशक्ति रखेंगे?
भैरोंघाटी में बँधा हर रक्षासूत्र एक मौन आग्रह है—
पेड़ बचाओ, हिमालय बचाओ, भविष्य बचाओ।
क्योंकि सच यही है—
हिमालय हैं तो हम हैं।
