उत्तराखंड की बोलियों का संरक्षण
उत्तराखंड की प्रमुख बोली गढ़वाली और कुमाऊंनी के संरक्षण किया जाएगा इसके लिए दून विश्वविद्यालय प्रमुख केंद्र कोला जाएगा पहली बार दोनों बोलियों को अधिकारिक मान्यता दिलाने की प्रक्रिया जल्द दून विशव विद्यालय शुरू करेगा।
विवि ने उत्तराखंड की भाषाओं एवं बोलियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए विवि की अकादमिक परिषद व कार्य परिषद से मंजूरी ले ली है। अब वित्तीय सहायता के लिए केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय व विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को रिपोर्ट भेजी जाएगी ताकि विश्वविद्यालय में स्थापित होने वाले उत्तराखंड भाषा एवं संस्कृति केंद्र में इस संबंध में अध्ययन एवं शोध कार्य शुरू हो सकें।
उत्तराखंड में 43 लाख से अधिक लोग गढ़वाली व कुमाऊंनी में बातचीत करते हैं। राज्य में 23.02 फीसद लोगों की मातृ भाषा गढ़वाली है। जबकि 19.94 फीसद लोगों की मातृ भाषा कुमाऊंनी है। यह जनगणना 2011 के आंकड़ों में दर्ज है। इन आंकड़ों को भारत के महापंजीयक व जनगणना आयुक्त कार्यालय ने जारी किया है।
जनगणना आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में 99 बोलियां व भाषा बोली जाती हैं। इनमें प्रमुख बोली-भाषा हिंदी, गढ़वाली, कुमाऊंनी के अलावा उर्दू, पंजाबी, जौनसारी, नेपाली आदि हैं। गढ़वाल मंडल में गढ़वाली और कुमाऊं मंडल में कुमाऊंनी की बहुलता अधिक है। गढ़वाली बोलने वाले लोगों की संख्या 23, 22,406 है जबकि कुमाऊंनी 20,11,286 लोगों की मातृ भाषा है।
कुछ समय पहले कुमाऊं विवि को कुमाऊंनी भाषा व दून विवि को गढ़वाली मातृ भाषा के संरक्षण व संवर्धन की जिम्मेदारी देने की शुरुआत हुई थी।
दून विवि के कुलपति डॉ. चंद्रशेखर नौटियाल दून विवि उत्तराखंड की मातृ भाषा और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन को लेकर कार्य कर रहा है। पहली बार गढ़वाली और कुमाऊंनी मातृ भाषा के प्रमाणीकरण के साथ ही अधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए काम किया जा रहा है। रिपोर्ट एमएचआरडी व यूसीजी को भेजी जाएगी। ताकि आर्थिक सहायता प्राप्त हो सके।
