17 साल पहले 13 साल की उम्र में गंवा दिए थे दोनों हाथ, पढ़िए मालविका की प्रेरणादायक कहानी
17 साल पहले 13 साल की मलविका अय्यर एक फटी जींस को ठीक करना चाहती थी। जिसके लिए वह कुछ तलाश रही थी जो इस काम में उसकी मदद कर सके। वो दौड़ते हुए अपने घर के गराज में गई और भारी वस्तु की तलाश में वह एक ग्रेनेड बम उठा लाई। उसका प्रयोग करने से पहले उसके बारे में वह कुछ समझ पाती कि ग्रेनेड फट गया और बच्ची ने अपने दोनों हाथ गंवा दिए और उसके शरीर में बहुत सी चोटें आईं। आज भी मालविका याद उस वक्त को याद करते हुए कहती हैं कि सबने सोच लिया था कि अब हमारी जिंदगी खत्म हो जाएगी। 
17 साल पहले 13 साल की उम्र में गंवा दिए थे दोनों हाथ, पढ़िए मालविका की प्रेरणादायक कहानी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली, Updated Wed, 04 Dec 2019 02:19 PM IST

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मालविका ने बताया कि मई, 2002 की छब्बीस तारीख। उस दिन सबकी छुट्टी थी, रविवार का दिन था। मैं नवीं कक्षा में थी। मम्मी-पापा सभी लोग घर पर थे। कुछ मेहमान उनसे मिलने आए थे। पापा मेहमानों के साथ बैठक कक्ष में बैठे थे। मेरी बहन उनके लिए रसोई में चाय बना रही थी। गर्मी बढ़ गई थी, सो मां कूलर में पानी भरने गई हुई थीं। तभी मेरी नजर अपनी जींस की फटी जेब पर गई।
मैंने सोचा, क्यों न इसे फेवीकॉल से चिपका दूं! यह सोचकर मैं गराज में किसी भारी वस्तु की तलाश में चली गई, जिससे चिपकाने के बाद जींस पर भार रखा जा सके। मेरे घर के पास ही सरकारी गोला-बारूद डिपो था। मुझे नहीं पता था कि हाल में ही उस डिपो में आग लगी है, जिससे डिपो में रखे कई विस्फोटक पदार्थ आसपास के इलाके में बिखर गए हैं।मालविका ने अपने जीवन के उन दर्दनाक अनुभवों को बयां करते हुए कहा कि वह पहली बार था जब मैं खूब रोई थी। जब मैं अस्पताल में बिस्तर पर थी मैंने कुछ औरतों को फुसफुसाते सुना था- ‘क्या तुमने जनरल वॉर्ड में उस लड़की को देखा? कितने दुख की बात है! जरूर इस बच्ची को किसी ने श्राप दिया होगा, इस लड़की जिंदगी तो अब खत्म हो गई है।

मैंने सोचा, क्यों न इसे फेवीकॉल से चिपका दूं! यह सोचकर मैं गराज में किसी भारी वस्तु की तलाश में चली गई, जिससे चिपकाने के बाद जींस पर भार रखा जा सके। मेरे घर के पास ही सरकारी गोला-बारूद डिपो था। मुझे नहीं पता था कि हाल में ही उस डिपो में आग लगी है, जिससे डिपो में रखे कई विस्फोटक पदार्थ आसपास के इलाके में बिखर गए हैं।मालविका ने बताया कि उन्हें दो साल तक अस्पताल में रहना पड़ा। इस दौरान उन्हें कई स्तर की सर्जरी से गुजरना पड़ा। वह महीनों तक चल भी न सकी। वह एक झटके में दुनिया की नजर में सामान्य से दिव्यांग बन चुकी थी। उन्होंने बताया कि उनका जन्म तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था, पर उनकी परवरिश राजस्थान के बीकानेर में हुई है। मालविका ने बताया कि जिंदगी भर याद रहने वाले उस हादसे के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पढ़ना जारी रखा।मालविका ने बताया कि उन्हें दो साल तक अस्पताल में रहना पड़ा। इस दौरान उन्हें कई स्तर की सर्जरी से गुजरना पड़ा। वह महीनों तक चल भी न सकी। वह एक झटके में दुनिया की नजर में सामान्य से दिव्यांग बन चुकी थी। उन्होंने बताया कि उनका जन्म तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था, पर उनकी परवरिश राजस्थान के बीकानेर में हुई है। मालविका ने बताया कि जिंदगी भर याद रहने वाले उस हादसे के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पढ़ना जारी रखा।मालविका ने अपने जीवन के उन दर्दनाक अनुभवों को बयां करते हुए कहा कि वह पहली बार था जब मैं खूब रोई थी। जब मैं अस्पताल में बिस्तर पर थी मैंने कुछ औरतों को फुसफुसाते सुना था- ‘क्या तुमने जनरल वॉर्ड में उस लड़की को देखा? कितने दुख की बात है! जरूर इस बच्ची को किसी ने श्राप दिया होगा, इस लड़की जिंदगी तो अब खत्म हो गई है।
मालविका ने बताया कि जब उन्हें बिना हाथों के ही पढ़ाई का यह बुखार चढ़ा था, तभी उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन की ओर से आमंत्रण भी मिला था। उन्होंने बताया कि किसी ने सच ही कहा है कि, गलत मनोभाव ही जीवन की एकमात्र विकलांगता है। मेरे मन में एक अलग प्रकार की उम्मीद जिंदा थी। मुझे पक्का भरोसा था कि मेरा शरीर भले ही अधूरा हो गया हो, पर इससे मेरी जिंदगी की पूर्णता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
मालविका ने बताया कि इस हालत में भी सामाजिक सरोकारों के लिए उनका हौसला देखकर उन्हें कई विदेशी संस्थाओं से अपने यहां मोटिवेशनल स्पीच (प्रेरक भाषण) देने के लिए बुलाया जाने लगा। उन्होंने बताया कि संघर्ष भरे दिनों में उनकी मां की कही वह बात उन्हें हमेशा याद रहेगी, जब उन्होंने कहा था, आईने के सामने खड़ी होकर मुस्करा के देखो, तुम्हें अपनी सूरत दुनिया में सबसे सुंदर दिखेगी।
मालविका ने कहा कि मैंने कई लोगों को देखा है, जो अपनी जिंदगी से परेशान दिखते हैं। वे सोचते हैं कि कोई बुरी बात उन्हीं के साथ ही क्यों हुई। मुझे लगता है कि ऐसी सोच ही उनके अंदर नकारात्मकता का प्रसार करती है। जरूरत है तो बस इसी सोच को बदलने की। बता दें कि मालविका अय्यर एक मोटिवेश्नल स्पीकर हैं, जिन्हें महिलाओं के सर्वोच्च नागिरक सम्मान से राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
