संपादकीय
योजनाएँ नहीं, जानकारी की कमी दिव्यांग परिवारों की सबसे बड़ी चुनौती
उत्तराखंड के संदर्भ में
भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून हैं, योजनाएँ हैं और नीतियाँ भी हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) ने ऑटिज़्म सहित 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को कानूनी मान्यता देकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार सुनिश्चित किए। इसके अतिरिक्त केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य बीमा, छात्रवृत्ति, कौशल विकास, पेंशन, पुनर्वास और स्वरोज़गार जैसी अनेक योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर आज भी अधूरा है—क्या इन योजनाओं की जानकारी वास्तव में उन परिवारों तक पहुँच रही है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है?
उत्तर है—अभी नहीं।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। यहाँ भौगोलिक परिस्थितियाँ, दूरस्थ गाँव, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएँ और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी पहले से ही दिव्यांग परिवारों की चुनौतियाँ बढ़ाती हैं। यदि सरकारी योजनाओं की जानकारी भी समय पर न मिले, तो यह स्थिति उनके लिए दोहरी मार बन जाती है।
पहाड़ में दिव्यांगता की अलग वास्तविकता
देहरादून, हरिद्वार या हल्द्वानी जैसे शहरों में कुछ विशेष विद्यालय, थेरेपी सेंटर और विशेषज्ञ उपलब्ध हैं, लेकिन पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, बागेश्वर और पिथौरागढ़ के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए ऐसी सुविधाएँ आज भी सीमित हैं।
यदि किसी बच्चे में ऑटिज़्म के शुरुआती लक्षण दिखाई देते हैं, तो अधिकांश परिवारों को यह भी नहीं पता होता कि किस अस्पताल में जाँच करानी है, दिव्यांगता प्रमाणपत्र कैसे बनता है, UDID कार्ड क्या है, कौन-सी छात्रवृत्ति उपलब्ध है या सरकार किस प्रकार की आर्थिक सहायता देती है।
अनेक माता-पिता वर्षों तक निजी खर्च पर इलाज कराते रहते हैं, जबकि वे कई सरकारी योजनाओं के पात्र होते हैं।
जानकारी का अभाव भी एक प्रकार की वंचना
किसी अधिकार से वंचित होना केवल तब नहीं होता जब सरकार योजना न बनाए। यदि योजना बनी हो, लेकिन उसकी जानकारी नागरिक तक न पहुँचे, तो वह भी समान रूप से वंचना है।
आज अधिकांश सरकारी सूचनाएँ वेबसाइटों और पोर्टलों पर उपलब्ध हैं। लेकिन क्या पहाड़ के हर गाँव में रहने वाला परिवार इंटरनेट, डिजिटल साक्षरता और सरकारी प्रक्रियाओं से परिचित है? क्या हर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता, ग्राम विकास अधिकारी या विद्यालय के शिक्षक को दिव्यांगजन योजनाओं की पूरी जानकारी है?
यदि उत्तर “नहीं” है, तो सूचना तंत्र को मजबूत करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है।
ग्राम पंचायत बने सूचना केंद्र
उत्तराखंड में प्रत्येक ग्राम पंचायत, आंगनबाड़ी केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को दिव्यांगजन सहायता सूचना केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
हर पंचायत भवन में निम्नलिखित जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए—
- दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनाने की प्रक्रिया।
- UDID कार्ड की जानकारी।
- ऑटिज़्म और अन्य न्यूरो-विकासात्मक स्थितियों के शुरुआती लक्षण।
- सरकारी योजनाओं की सूची।
- जिला स्तर के पुनर्वास केंद्रों और विशेषज्ञ चिकित्सकों का संपर्क।
- छात्रवृत्ति, पेंशन और स्वास्थ्य बीमा की जानकारी।
यदि यह व्यवस्था लागू हो जाए, तो हजारों परिवारों को समय पर सहायता मिल सकती है।
उत्तराखंड में क्या किया जा सकता है?
राज्य सरकार को निम्नलिखित पहल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए—
- प्रत्येक जिले में ऑटिज़्म एवं न्यूरो-डेवलपमेंटल रिसोर्स सेंटर की स्थापना।
- मोबाइल पुनर्वास एवं थेरेपी वैन, जो दूरस्थ गाँवों तक सेवाएँ पहुँचाएँ।
- स्कूल शिक्षकों, आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को ऑटिज़्म की पहचान का प्रशिक्षण।
- टेलीमेडिसिन के माध्यम से विशेषज्ञों से ऑनलाइन परामर्श।
- जिला अस्पतालों में नियमित बहु-विषयक (Multidisciplinary) क्लीनिक।
- स्थानीय भाषाओं—गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी—में जागरूकता सामग्री।
- प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर दिव्यांग सहायता एवं परामर्श केंद्र।
मीडिया की भी जिम्मेदारी
समाचार माध्यम अक्सर दुर्घटनाओं, राजनीति और विवादों पर अधिक ध्यान देते हैं, जबकि दिव्यांगजन अधिकार जैसे विषय सीमित कवरेज पाते हैं।
यदि प्रत्येक समाचार पत्र, स्थानीय टीवी चैनल और डिजिटल पोर्टल सप्ताह में एक बार सरकारी योजनाओं की जानकारी प्रकाशित करें, तो हजारों परिवारों तक महत्वपूर्ण सूचनाएँ पहुँच सकती हैं।
स्थानीय पत्रकारों की भूमिका केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को उसके अधिकारों से परिचित कराना भी है।
समाज की संवेदनशीलता आवश्यक
ऑटिज़्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरो-विकासात्मक स्थिति है। ऐसे बच्चों और वयस्कों को दया नहीं, अवसर चाहिए। परिवारों को सहानुभूति नहीं, सहयोग चाहिए। और सबसे बढ़कर, उन्हें जानकारी चाहिए—क्योंकि सही समय पर मिली जानकारी किसी बच्चे का भविष्य बदल सकती है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड “देवभूमि” होने के साथ-साथ “संवेदनशील समाज” का भी उदाहरण बने, यह तभी संभव है जब विकास की धारा में दिव्यांगजन और उनके परिवार समान रूप से शामिल हों।
आज आवश्यकता नई योजनाएँ बनाने से अधिक उन योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने की है। जिस दिन पहाड़ के अंतिम गाँव में रहने वाला एक माता-पिता बिना किसी दलाल, सिफारिश या भटकाव के अपने बच्चे के अधिकारों और सरकारी सुविधाओं की जानकारी प्राप्त कर सकेगा, उसी दिन दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करेगा।
समावेशी भारत का सपना कानूनों से नहीं, बल्कि जानकारी, संवेदनशीलता और प्रभावी क्रियान्वयन से साकार होगा।
— दिव्यांगवाणी संपादकीय मंडल
