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15 साल पहले इस गांव में थी पानी की किल्‍लत, अब बना नीति आयोग का जल ग्राम

बांदा (banda) के जखनी गांव में आज गरीब से गरीब किसान 50 हजार की धान पैदा करता है, जिसके पास कभी साहूकार का कर्ज चुकाने के पैसे नहीं होते थे. आज उसके बैंक खाते में ठीक-ठाक पैसे होते हैं शिरीन-फरहाद की प्रेम कहानी हम सभी ने सुनी है. साधारण सी कहानी जिसमें एक लड़का है, जिसे कभी राजकुमार बताया जाता है तो कभी एक सामान्य लड़का. उसे एक राजकुमारी से प्यार हो जाता है. चूंकि लड़की राजकुमारी है तो उसका प्यार पाना आसान नहीं है. उसके साथ एक ना पटने वाली खाई जैसी शर्त भी रखी जाती है. शर्त है कि फरहाद को पहाड़ काटकर एक नहर निकालना है. कुछ जगह इसे दूध की नदी के रूप में भी इंगित किया गया है.

सभी को लगता है कि शर्त ऐसी है कि फरहाद उसे पूरा नहीं कर पाएगा और अपने कदम पीछे हटा लेगा. लेकिन फरहाद तो जुनूनी था. तो वो शर्त मान लेता है. कहानी की खास बात यह है कि फरहाद अपनी शर्त लगभग पूरी भी कर देता है लेकिन जब राजा उसे शर्त पूरी करता हुआ पाता है तो वो उसे शिरीन के मरने की झूठी खबर पहुंचाता है. खबर सुनकर फरहाद दुखी होकर अपनी जान ले लेता है. शिरीन को जब मालूम चलता है तो वो भी अपनी जान दे देती है.

फसानों की दुनिया से जब हम हकीकत की धरती पर कदम रखते हैं तो हम 1960 के बिहार के गया के पास मौजूद गहलौर गांव में पहुंच जाते हैं. जहां एक आदमी की पत्नी पहाड़ के उस पार काम कर रहे अपने पति के लिए खाना ले जाते वक्त पहाड़ी से गिर जाती है. पहाड़ की 55 किलोमीटर की दूरी को पार करते हुए दवाओं और इलाज के अभाव में उसकी मौत हो जाती है.

अपनी पत्नी की मौत से उस आदमी के सिर पर एक जुनून सवार हो जाता है और वो गहलौर की पहाड़ी को काटकर 360 फुट लम्बा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता बनाने का फैसला कर लेता है. वो भी सिर्फ एक हथौड़ी और छेनी के सहारे. लगातार 22 सालों तक लोगों की मज़ाक का साधन बनते हुए भी उस आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता है और एक दिन वो 55 किलोमीटर के रास्ते को घटाकर 15 किलोमीटर का कर देता है. आप जानते होंगे कि यह आदमी दशरथ मांझी था.

कहानियों की दुनिया का फरहाद हो या हकीकत की दुनिया के दशरथ, जब इन्होंने काम शुरू किया तो इनका मजाक बना. इन्हें कोई मदद नहीं मिली. बस इन पर एक जुनून सवार था. प्रेम में वो ताकत होती है कि वो हमें ऐसा जुनूनी बना देता है कि हमें बस करते रहना याद रह जाता है. कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके लिए प्रकृति, उनकी धरती, उसी शिरीन या दशरथ मांझी की पत्नी की तरह ही है, जिससे वो बेइंतेहा मोहब्बत करते हैं और उसे मरते हुए नहीं देख सकते. खास बात ये है कि अक्सर इस तरह के काम करने वालों का काम बाद में सरकारें सराहती भी हैं और उन्हें पहचान भी देती है.

बांदा का जखनी गांव भी ऐसा ही गांव है. यहां के जुनूनी लोगों की बदौलत इस गांव में पानी के स्तर में तो अभूतपूर्व सुधार हुआ ही साथ ही गांव की सफलता इस कदर हैरान कर देने वाली है कि नीति आयोग को भी अपने जल प्रबंधन इंडेक्स में इस गांव को शामिल करना पड़ा. नीति आयोग के मुताबिक बांदा का जखनी गांव भारत के उन गांवों में से है, जिसने सामुदायिक भागीदारी की बदौलत पानी के मामले में खुद को स्वावलंबी बना लिया है.

बांदा के जखनी गांव में मेड़बंदी करती जेसीबी

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By udaen

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