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राजघाट: बापू का सामधि स्थल जहां दुनिया के ताकतवर लोग झुकाते हैं सिर

राजघाट वर्ष 1950 से विशिष्ट विदेशी मेहमान पौधा लगा रहे हैं। अंतिम पौधा 11 फरवरी, 2016 को अबू धाबी के युवराज और संयुक्त अरब अमीरात के सर्वोच्च उपसेनाध्यक्ष मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने लगाया था।बापू का समाधि स्थल, राजघाट।राजघाट से परिचय के लिए किसी भी तरह की भूमिका की जरूरत नहीं है। यह महात्मा गांधी का समाधि स्थल है जिसे 31 जनवरी ,1948 को उनकी अंत्येष्टि के बाद बनाया गया था। यह 50 के दशक के मध्य तक यूं ही रहा। फिर इसे नए सिरे से बनाया गया। दरअसल राजघाट का डिजाइन तैयार करने के लिए अमेरिका के महान आर्किटेक्ट फ्रेंक लायड राइट से भी संपर्क किया गया था। पर इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया गया क्योंकि संसद में विपक्ष ने तगड़ा बवाल किया था। विपक्ष की मांग थी कि बापू की समाधि का डिजाइन कोई भारत का ही आर्किटेक्ट तैयार करे।किसने बनाया राजघाट का डिजाइन
इसके बाद यह महत्वपूर्ण दायित्व वानू जी भूपा को सौंपा गया। भूपा की डिजाइन में एक तरह की गरिमामय सादगी थी। उन्होंने राजघाट परिसर के बीचों-बीच एक वर्गाकार स्पेस में समाधि बनाई। उस पर बापू के बोले अंतिम शब्द ‘हे राम’ रखे। भूपा ने समाधि के चारों तरफ बड़ा सा स्पेस हरियाली के लिए छोड़ा। पर भूपा ने इसके अलावा शायद ही राजधानी में कोई अन्य प्रॉजेक्ट पर काम किया। घाट परिसर की लैंड स्केपिंग की थी मेरठ में जन्मे एंग्लो इंडियन एलिश पर्सी लैंकस्टेर ने।वो भी भारत सरकार के बागवानी विभाग से जुड़े रहे थे।यहां किस-किस ने लगाए पौधे
राजघाट वर्ष 1950 से विशिष्ट विदेशी मेहमान पौधा लगा रहे हैं। अंतिम पौधा 11 फरवरी, 2016 को अबू धाबी के युवराज और संयुक्त अरब अमीरात के सर्वोच्च उपसेनाध्यक्ष मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने लगाया था। उन्होंने जो पौधा लगाया, वह मोलश्री का है। दुर्भाग्यवश देखभाल में लापरवाही के चलते विशिष्ट विदेशी अतिथियों द्वारा लगाए गए कुछ पेड़ सूखते भी रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री कृष्णा प्रसाद भट्टाराई द्वारा 9 जून, 1990 को लगाया गया कदंब का पेड़ सूख गया है। इसी तरह 21 जनवरी, 1961 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा राजघाट पर लगाए गए पाइनस लोंजीफोलिया के पेड़ का अब अस्तित्व नहीं है।

दो बार आए ओबामा
अमेरिकी के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा राजघाट पर बापू को श्रद्धांजलि देने दो बार आए थे। ओबामा अक्सर अपने जीवन पर महात्मा गांधी के प्रभाव का जिक्र करते रहे हैं। वे 2012 और 2015 में अपनी भारत यात्रा के समय राजघाट आए थे। उन्हें 20 फरवरी, 2015 को राजघाट यात्रा के समय गांधी के प्रसिद्ध ‘चरखा’ की प्रतिकृति भेंट की गई थी। ओबामा ने यहां पर पीपल का पौधा भी लगाया और अतिथि पुस्तिका पर लिखा। ओबामा ने 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार स्वीकार करने के दौरान भी उनका जिक्र किया था। यह पूछे जाने पर कि जीवित या मृत शख्सियतों में से कौन उनके पसंदीदा हैं, तब उन्होंने बापू का नाम लिया था।

राजघाट पर नम हो गई थीं मार्टिन लूथर किंग की आखें
अमेरिका में अश्वेतों के हकों के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले मार्टिन लूथर किंग 1959 में सपत्निक राजघाट आए थे। राजघाट पर बापू को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए दोनों की आंखें नम हो गईं थीं। कुछ संभले तो वहां पर मौजूद लोगों ने उनसे पूछा कि आप दोनों कि आंखों से आंसुओं की अविरल धारा क्यों बहने लगी थी? मार्टिन लूथर ने जवाब दिया- गांधी उनके मार्गदर्शक हैं। वो गांधी के दिखाए सत्य और अंहिंसा के मार्ग पर चलकर ही अमेरिका में दबे-कुचले अश्वेतों के पक्ष में लड़ पाते हैं।

राजघाट पर बेहद तनाव में दिखे थे मुशर्रफ
तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुर्शरफ 17 जुलाई,2001 को राजघाट गए थे। वो राजघाट पर पहुंचने के बाद से ही बेहद तनाव में थे। उन्होंने वहां पर विजिटर्स बुक में बापू की शख्सियत के बारे में लिखा भी था। तब कुछ ग्राफोलोजिस्ट (हैंड राइटिंग के विशेषज्ञ) ने उनकी हैंड राइटिंग का अध्ययन करने के बाद दावा किया था कि मुशर्रफ राजघाट पर विजिटर्स बुक पर लिखते वक्त भी तनाव में थे।

राजघाट पर 30 जनवरी की रात
30 जनवरी, 1948 को रात के करीब 9 बजे प्रधानमंत्री जवाहर नेहरू, गृह मंत्री सरदार पटेल और भारत सरकार के कई आला अफसर राजघाट पहुंचे। उस वक्त ओस और घने कोहरे ने दिल्ली को अपने आगोश में ले लिया था। उस शाम हुई बापू की हत्या से सारा देश अवाक था। नेहरू और अन्य जब राजघाट पहुंचे तब तक वहां केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के अफसर मजदूरों के साथ उस चबूतरे के निर्माण के कार्य में जुटे हुए थे, जहां पर बापू की अगले दिन अंत्येष्टि होनी थी।

30 जनवरी के उस मनहूस दिन नेहरू कैबिनेट की बैठक में बापू की अंत्येष्टि स्थल पर चर्चा हुई। उसमें तय हुआ कि राजघाट सबसे बेहतर जगह रहेगी अंत्येष्टि के लिए। एक तो यह यमुना नदी के किनारे है और फिर ये राजधानी के मध्य में भी है। उसके बाद संबंधित अफसरों और विभागों को अंत्येष्टि स्थल की सारी व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। दिल्ली के इंस्पेक्टर जनरल पुलिस डब्ल्यू.वी. संजीव को अंत्येष्टि वाले दिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश मिला था।


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By udaen

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