सचिवालय से हर साल एक सर्कुलर जारी कर प्राप्त सूचना को प्रकाशित किया जाता है। विधायकों द्वारा संपत्ति का ब्योरा न देने के उदासीन रवैये के पीछे मुख्य कारण यह है कि यह प्रावधान बाध्यकारी नहीं, बल्कि स्वैच्छिक है। उत्तराखंड की मौजूदा चौथी विधानसभा जल्द अपना आधा, यानी ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर रही है। इस अवधि में 71 में से केवल 25 विधायकों ने ही विधानसभा सचिवालय में अपनी संपत्ति की जानकारी देने में रुचि प्रदर्शित की। शेष 46 विधायकों का रुख इस मामले में अब तक उदासीन ही है।
उत्तराखंड में विधानसभा सदस्यों को अपनी संपत्ति का ब्योरा विधानसभा सचिवालय को देना होता है। हर साल इस ब्योरे को अपडेट कर विधानसभा सचिवालय इसका गजट नोटिफिकेशन करता है। उत्तराखंड में भी उत्तर प्रदेश मंत्री तथा विधायक (आस्तियों तथा दायित्वों का प्रकाशन) अधिनियम 1975 की धारा 3(2) एवं धारा 4 में निर्धारित समय के भीतर विधायकों से प्राप्त संपत्ति के विवरण को विधानसभा सचिवालय द्वारा सार्वजनिक किया जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि संपत्ति का ब्योरा न देने वालों में मंत्रिमंडल के चार सदस्य भी शामिल हैं। अगर सियासी पार्टियों की सदस्य संख्या के लिहाज से देखें तो भाजपा के 57 विधायकों (इनमें कैबिनेट मंत्री रहे स्व. प्रकाश पंत भी शामिल हैं, उन्होंने अपनी संपत्ति का ब्योरा विधानसभा सचिवालय को दे दिया था) में से केवल 24 ने ही संपत्ति का विवरण सचिवालय में दिया।
