चकबन्दी में समायी है उत्तराखण्ड की समृद्धि
– गणेश सिंह ‘गरीब’
लगभग पिछले चालीस से भी अधिक सालों से पहाड़ों में चकबन्दी आन्दोलन के प्रणेता गणेश सिंह ‘गरीब’ पहाड़ों में अनिवार्य-चकबन्दी के लिये निरन्तर प्रयासरत हैं। चकबन्दी से स्वावलम्बन के सशक्त पक्षधर गणेश सिंह ‘गरीब’ का मानना है कि चकबन्दी से न सिर्फ पलायन रूकेगा बल्कि उत्तराखण्ड की आर्थिक समृद्धि भी चकबन्दी मेंं समायी हुई है। कोटद्वार में एक कार्यक्रम में प्रतिभाग करने आये ‘गरीब’ से टूरिस्ट सन्देश के सम्पादक सुभाष चन्द्र नौटियाल ने विस्तृत वार्ता की प्रस्तुत है वार्ता के प्रमुख अंश…………
प्रश्न- आप पिछले चालीस सालों से उत्तराखण्ड में चकबन्दी के लिये प्रयासरत हैं परन्तु वास्तव में चकबन्दी होती क्या है?
प्रश्न- अपने दो शब्दों ‘सुनियोजित’ तथा ‘न्यायोचित’ पर बहुत जोर दिया है वास्तव में ‘सुनियोजित’ तथा ‘न्यायोचित’ से आपका क्या आशय है ?
प्रश्न- पहाड़ों में चकबन्दी क्यों आवश्यक है ?
‘गरीब’– वास्तव में उत्तराखण्ड की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक समृद्धि चेकबन्दी में समायी हुयी है। चेकबन्दी का सीधा सम्बन्ध खेती, गांव और किसानी से जुड़ा हुआ है। उत्तराखण्ड का प्रत्येक मूल निवासी मूलरूप से किसान है। किसान का सीधा सम्बन्ध खेती व जमीन से है। किसान ही जीवधारियों का अन्नदाता है। किसान को जहां भी खेती योग्य जमीन उपलब्ध हुई वहीं पर उसने अपना गाँव बसाया। खेती, किसानी को अपनाते हुए ही गांवों में देश काल परिस्थिति के अनुसार लोकगीतों, लोकधुनों, वाद्य यंत्रों तथा भाषा का प्रचार-प्रसार हुआ है। इस तरह से हजार वर्षों के सतत् प्रयास के पश्चात् हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति, हमारी पहचान, हमारे अस्तित्व, रीति-रिवाज, नाते-रिश्ते आदि का विकास हुआ है। उत्तराखण्ड में यदि बिखरी जोत की समस्या न हो तो यह राज्य भी हिमाचल की तरह ही सम्पन्न हो सकता है। चक उपलब्ध होने पर राज्य के ग्रामीण अंचल के लाखों परिवार पूर्ण रूप से कृषि भूमि को उत्पादनोन्मुखी बनाकर स्वरोजगार व आमदनी कमा सकते हैं। भूमि का एक स्थान पर चक उपलब्ध होने पर भूस्वामी अपनी जमीन के अनुसार चक में अपनी सोच, सुविधा, भूमि योग्यता, अपनी सामर्थ्य तथा आवश्यकतानुसार योजना तैयार कर सकता है।
भूस्वामी यहां पर वैज्ञानिक तरीके से लाभकारी खेती, बागवानी, पशुपालन, उद्यान, वानिकी आदि का कार्य अपनी सुविधानुसार कर सकता है। यदि उत्तराखण्ड में चकबन्दी लागू होती है तो अनुसूचित जाति, जनजाति व भूमिहीनों को भी भू-स्वामित्व का अधिकार मिल सकता है। यहां के काश्तकार, शिल्पकार एवं दस्तकार अपने पुश्तैनी कार्य में जुट सकते हैं। चकबन्दी लागू होने से परिवार में बंटवारे-संटवारे, क्रय-विक्रय, संजायती खाते सम्बन्धी भूमि विवाद समाप्त हो सकते हैं। भूमि तथा जल संरक्षण की जानकारी उत्तराखण्ड के पुरातन ज्ञान में समायी हुई है। पर्यावरण में उत्तराखण्ड की जनता की सदैव स्वैच्छिक भागीदारी रही है। चकबन्दी होने से यहां के लोक संस्कार, संस्कृति, बोली-भाषा, सामाजिक रीति-रिवाज, रिश्ते-नाते, गाँव खेत व बीज सुरक्षित रह सकते हैं।
प्र0- व्यावहारिक रूप में चकबन्दी कैसे सम्भव है ?
‘गरीब’– व्यावहारिक रूप में चकबन्दी अभी इसलिये मुश्किल लग रही है क्योंकि वास्तव में राज्य सरकार ने अभी तक चकबन्दी के अनुकूल वातावरण ही तैयार नहीं किया है। राज्य सरकार ने चकबन्दी समिति का गठन तो किया है परन्तु उत्तराखण्ड में गठित अभी तक की सरकारें चकबन्धी का मूल आशय ही नहीं समझ पायी हैं। राज्य सरकारों ने उत्तराखण्ड के आमजनमानस को चकबन्धी के नाम पर भटकाने का कार्य किया है। राज्य में कम से कम एक आदर्श गाँव तो विकसित किया जा सकता है। यदि सरकार वातावरण बनाये और चकबन्दी की मूल भावना के अनुरूप आगे बढ़े तो इसके सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश आज कृषि बागवानी क्षेत्र में हमसे कई गुना आगे है। यही कारण है कि आज हिमाचल से नगण्य पलायन हुआ है। वहीं दूसरी ओर हमारे राज्य में पलायन तेजी से हुआ है। यदि भूमि सुधार व चकबन्दी कार्यक्रम को राज्य सरकार एक अभियान के रूप में अपनाती है तो निश्चित रूप से केवल एक दशक से भी कम समय में राज्य में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।

