‘Making Molehills of Mountains’ की नई किताब का लोकार्पण
देहरादून। उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आपदाओं और विकास के बदलते स्वरूप के बीच SDC Foundation की नई पुस्तक “Making Molehills of Mountains: Communities and Constitutional Rights in the Times of Climate Crisis” का लोकार्पण किया गया। पुस्तक ऐसे समय सामने आई है जब उत्तराखंड में आपदाओं का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और इसका असर केवल दूरस्थ पर्वतीय गांवों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक भी पहुंच रहा है।
नई पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह जलवायु संकट को केवल पर्यावरणीय या आपदा प्रबंधन का विषय नहीं मानती, बल्कि इसे समुदायों के अधिकार, संवैधानिक संरक्षण, विकास की प्राथमिकताओं और शासन की जवाबदेही से जोड़कर देखने की कोशिश करती है।
पहाड़ों में बदल रही है आपदाओं की तस्वीर
उत्तराखंड लंबे समय से भूकंप, भूस्खलन, बादल फटने, अतिवृष्टि, बाढ़ और जंगलों की आग जैसी आपदाओं के प्रति संवेदनशील रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में घटनाओं की तीव्रता और उनके भौगोलिक प्रभाव को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं।
22 अगस्त 2026 को पुस्तक के लोकार्पण के दौरान विशेषज्ञों ने 2025 की आपदाओं के विश्लेषण के आधार पर इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि आपदाओं का स्वरूप बदल रहा है और चरम मौसम की घटनाओं के कारण नए जोखिम पैदा हो रहे हैं।
इस बदलते परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की विकास नीति भी उसी गति से बदल रही है?
विकास बनाम पर्यावरण नहीं, बल्कि विकास का तरीका सवाल है
उत्तराखंड में सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं, भवन निर्माण और शहरी विस्तार को विकास की अनिवार्य जरूरत के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन सवाल विकास का विरोध करने का नहीं, बल्कि विकास के वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक आधार का है।
पुस्तक की व्यापक विमर्श-परंपरा इसी सवाल को उठाती है कि क्या हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में मैदानी क्षेत्रों के विकास मॉडल को उसी रूप में लागू किया जा सकता है।
पहले संस्करण “Making Molehills of Mountains: Demystifying Disasters in Devbhoomi Uttarakhand” में भी विशेषज्ञों और लेखकों ने अनियोजित निर्माण, पर्वत कटान, जल निकासी, आपदा प्रबंधन और पर्यावरणीय नीति के बीच संबंधों पर चर्चा की थी।
समुदायों को सिर्फ ‘पीड़ित’ क्यों माना जाए?
नई किताब के शीर्षक में Communities and Constitutional Rights का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
आपदा आने के बाद स्थानीय लोग अक्सर ‘पीड़ित’, ‘प्रभावित’ या ‘लाभार्थी’ के रूप में दर्ज होते हैं। लेकिन क्या उन्हें विकास और पर्यावरण से जुड़े निर्णयों में सक्रिय भागीदार माना जाता है?
यही वह प्रश्न है जिसे गंभीरता से देखने की जरूरत है।
पहाड़ का निवासी केवल आपदा का शिकार नहीं है। वह उस भूगोल, जलस्रोत, जंगल, कृषि व्यवस्था और स्थानीय पारिस्थितिकी का लंबे समय से जानकार भी है। पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभव को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक के साथ जोड़ना आपदा जोखिम कम करने की महत्वपूर्ण रणनीति हो सकती है।
संविधान और पर्यावरण का रिश्ता
जलवायु संकट को संवैधानिक अधिकारों से जोड़ना इस पुस्तक की बहस को और व्यापक बनाता है।
स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण का प्रश्न केवल पर्यावरण नीति का प्रश्न नहीं है। यह जीवन, आजीविका, समानता, गरिमा और सुरक्षित जीवन से भी जुड़ता है।
जब किसी सड़क, बांध, सुरंग, खनन परियोजना या शहरी विस्तार से स्थानीय समुदाय की भूमि, जलस्रोत, आजीविका या पारिस्थितिकी प्रभावित होती है, तब सवाल केवल परियोजना की आर्थिक उपयोगिता का नहीं रह जाता। सवाल यह भी होता है कि निर्णय प्रक्रिया में प्रभावित समुदाय की आवाज कितनी सुनी गई।
धाराली आपदा की पृष्ठभूमि में पुस्तक का महत्व
नई पुस्तक का लोकार्पण ऐसे समय हुआ जब उत्तराखंड हाल ही में धाराली की विनाशकारी आपदा का सामना कर चुका है। 5 अगस्त को संभावित ग्लेशियल घटना के बाद खीर गाड़/खीर गंगा क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ ने धाराली में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। बाजार, होटल, विद्यालय और घर प्रभावित हुए। पुस्तक को इस आपदा के पीड़ितों को समर्पित किया गया।
इसलिए पुस्तक का विमर्श केवल अकादमिक चर्चा तक सीमित नहीं रह जाता। यह वर्तमान उत्तराखंड की वास्तविकता से सीधे जुड़ता है।
उत्तराखंड के सामने असली चुनौती
उत्तराखंड के सामने चुनौती केवल आपदाओं से निपटने की नहीं है। असली चुनौती है—ऐसा विकास मॉडल तैयार करना जो पहाड़ की भौगोलिक और पारिस्थितिक सीमाओं को स्वीकार करे।
इसके लिए तीन स्तरों पर बदलाव जरूरी हैं—
पहला—नीति में बदलाव।
विकास परियोजनाओं की स्वीकृति में स्थानीय पारिस्थितिकी, जलवायु जोखिम और वहन क्षमता को केंद्रीय आधार बनाया जाए।
दूसरा—समुदाय की भागीदारी।
ग्राम सभाओं और स्थानीय संस्थाओं को केवल औपचारिक परामर्श तक सीमित न रखकर निर्णय प्रक्रिया का वास्तविक हिस्सा बनाया जाए।
तीसरा—जवाबदेही।
आपदा के बाद राहत और मुआवजे के साथ यह भी तय होना चाहिए कि जोखिम पैदा करने वाले कारकों की पहचान किसने की, चेतावनियों की अनदेखी क्यों हुई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए।
‘मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ का बड़ा सवाल
इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शायद यही है कि यह उत्तराखंड की पर्यावरणीय बहस को ‘विकास बनाम पर्यावरण’ की पारंपरिक बहस से आगे ले जाने का प्रयास करती है।
क्योंकि पहाड़ को बचाने का मतलब विकास रोकना नहीं है।
सवाल यह है कि विकास किसके लिए, किस कीमत पर, किस भूगोल में और किसकी भागीदारी से किया जा रहा है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में रहने वाले समुदायों को विकास के आंकड़ों में केवल लाभार्थी या आपदा के समय प्रभावित व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता। वे इस हिमालयी भूगोल के सबसे महत्वपूर्ण हितधारक हैं।
जलवायु संकट के दौर में यही दृष्टिकोण भविष्य की नीति का आधार बन सकता है।
किताब का संदेश इसलिए केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। यह लोकतंत्र, संवैधानिक अधिकार और विकास की जवाबदेही—तीनों को एक साथ देखने की जरूरत की ओर संकेत करती है।
