Spread the love

पत्रकारिता की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन यह कानून से ऊपर होने का लाइसेंस नहीं है।

डिजिटल क्रांति ने पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। कभी समाचार संकलन के लिए संस्थान, प्रेस कार्ड, कैमरा टीम और प्रसारण व्यवस्था जरूरी मानी जाती थी। आज एक स्मार्टफोन, इंटरनेट कनेक्शन और YouTube चैनल के जरिए कोई भी व्यक्ति घटनास्थल से लाइव प्रसारण कर सकता है।

यह बदलाव लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है। इससे आम नागरिक की आवाज को मंच मिला है और पारंपरिक मीडिया की सीमाओं के बाहर भी अनेक मुद्दे सामने आए हैं।

लेकिन इसी के साथ एक नया संकट भी पैदा हुआ है—क्या कैमरा और माइक हाथ में आते ही कोई व्यक्ति पत्रकार बन जाता है?

और उससे भी बड़ा सवाल—क्या पत्रकार होने का दावा किसी व्यक्ति को किसी भी परिसर में प्रवेश करने, किसी से भी जवाब मांगने और किसी का वीडियो बनाने का असीमित अधिकार देता है?

इसका उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता बनाम कानून की सीमा

पत्रकारिता का मूल काम सवाल पूछना, सत्ता और संस्थाओं की जवाबदेही तय करना तथा समाज के सामने तथ्य रखना है। लेकिन लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता नहीं है।

किसी सरकारी कार्यालय में जाकर सूचना मांगना और किसी निजी परिसर में बिना अनुमति प्रवेश करना दो अलग बातें हैं।

किसी अस्पताल में सार्वजनिक हित के मुद्दे पर सवाल उठाना और मरीज का चेहरा कैमरे में कैद करना दो अलग बातें हैं।

किसी स्कूल की व्यवस्था पर रिपोर्ट करना और बिना अनुमति स्कूल परिसर में घुसकर बच्चों से कैमरे के सामने पूछताछ करना भी दो अलग बातें हैं।

पत्रकारिता का अधिकार है, लेकिन वह असीमित प्रवेश-अधिकार नहीं है।

स्कूलों को लेकर विशेष सावधानी क्यों?

स्कूलों का मामला सबसे संवेदनशील है, क्योंकि वहां बच्चे होते हैं।

बच्चे किसी पत्रकार के लिए “कंटेंट” नहीं हैं। उनकी सुरक्षा, निजता और गरिमा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

किसी घटना की रिपोर्टिंग करते समय यदि बच्चों की पहचान सामने आती है, उनके चेहरे रिकॉर्ड किए जाते हैं या उनसे ऐसे सवाल पूछे जाते हैं जो उनकी निजता और सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं, तो पत्रकारिता की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।

विशेष रूप से POCSO से संबंधित मामलों में बच्चे की पहचान उजागर करने को लेकर कानून अत्यंत गंभीर है।

इसलिए “कैमरा ऑन करो और बच्चा बोलने लगे” वाली सोशल मीडिया पत्रकारिता न तो जिम्मेदार पत्रकारिता है और न ही इसे सामान्य पत्रकारिता की स्वतंत्रता के नाम पर उचित ठहराया जा सकता है।

YouTuber होना और पत्रकार होना

यहां एक और महत्वपूर्ण बहस जरूरी है।

क्या YouTuber पत्रकार हो सकता है?

बिल्कुल हो सकता है।

पत्रकारिता का भविष्य केवल पारंपरिक मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं है। डिजिटल पत्रकारिता, स्वतंत्र पत्रकार, नागरिक पत्रकारिता और छोटे स्थानीय डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

लेकिन पत्रकारिता का मूल्यांकन केवल माध्यम से नहीं, कार्यप्रणाली और आचरण से होना चाहिए।

YouTube पर समाचार प्रसारित करने वाला व्यक्ति पत्रकार हो सकता है, लेकिन YouTube चैनल उसे कानून से छूट नहीं देता।

उसे भी तथ्य सत्यापित करने होंगे।

उसे भी निजता का सम्मान करना होगा।

उसे भी बच्चों के मामले में अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।

उसे भी मानहानि और अन्य कानूनी प्रावधानों का ध्यान रखना होगा।

और उसे भी किसी परिसर के प्रवेश नियमों का सम्मान करना होगा।

“कैमरे के सामने जवाब दीजिए”—क्या यह अधिकार है?

सोशल मीडिया पर एक दृश्य तेजी से सामान्य हो रहा है।

कोई व्यक्ति किसी दुकान, अस्पताल, स्कूल या सरकारी कार्यालय में कैमरा लेकर पहुंचता है और सामने वाले से कहता है—

“कैमरे के सामने जवाब दीजिए।”

लेकिन सवाल यह है कि जवाब देना किसका कानूनी दायित्व है?

पत्रकार सवाल पूछ सकता है। लेकिन हर व्यक्ति पत्रकार के सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं है।

सार्वजनिक पद पर बैठे अधिकारी और निजी नागरिक की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं होती। किसी सार्वजनिक संस्था के कामकाज पर सवाल पूछने का अधिकार और किसी व्यक्ति को कैमरे के सामने खड़ा करके जवाब देने के लिए मजबूर करने का अधिकार अलग-अलग हैं।

इस अंतर को समझना आज की डिजिटल पत्रकारिता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

पत्रकारिता की आड़ में दबाव?

सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब कैमरे को पत्रकारिता का उपकरण नहीं बल्कि दबाव बनाने का हथियार बना दिया जाता है।

“वीडियो वायरल कर दूंगा।”

“आपको सोशल मीडिया पर बदनाम कर दूंगा।”

“कैमरे के सामने जवाब दो।”

“मैं पत्रकार हूं, मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

ऐसी भाषा पत्रकारिता की गरिमा को नुकसान पहुंचाती है।

सवाल पूछना पत्रकारिता है।

धमकी देना पत्रकारिता नहीं।

आलोचना पत्रकारिता है।

अपमान करना पत्रकारिता नहीं।

तथ्य सामने रखना पत्रकारिता है।

जानबूझकर झूठ फैलाना पत्रकारिता नहीं।

सार्वजनिक हित में जांच करना पत्रकारिता है।

किसी की निजी जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करना पत्रकारिता नहीं।

“फर्जी पत्रकार” शब्द का इस्तेमाल भी सावधानी से हो

यहां मीडिया संस्थानों और प्रशासन को भी आत्ममंथन करना चाहिए।

हर स्वतंत्र YouTuber को “फर्जी पत्रकार” कह देना भी उचित नहीं है।

कई स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार सीमित संसाधनों में महत्वपूर्ण और साहसिक पत्रकारिता कर रहे हैं। पारंपरिक मीडिया संस्थानों से बाहर होना किसी व्यक्ति को स्वतः फर्जी नहीं बनाता।

असल सवाल यह होना चाहिए—

क्या वह तथ्यात्मक पत्रकारिता कर रहा है?

क्या वह अपनी पहचान स्पष्ट करता है?

क्या वह आरोप लगाने से पहले संबंधित पक्ष का पक्ष लेता है?

क्या वह बच्चों और संवेदनशील व्यक्तियों की निजता का सम्मान करता है?

क्या वह तथ्य और राय के बीच अंतर करता है?

क्या वह गलती होने पर सुधार प्रकाशित करता है?

क्या वह किसी व्यक्ति या संस्था को धमकाकर या दबाव बनाकर सामग्री तैयार करता है?

पत्रकारिता की विश्वसनीयता इन्हीं कसौटियों से तय होनी चाहिए।

संस्थानों की भी जिम्मेदारी है

यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति स्कूल या अन्य संस्थान में पहुंचता है तो संस्थान को भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए।

उससे पहचान पूछी जा सकती है।

उसके रिपोर्टिंग उद्देश्य के बारे में जानकारी ली जा सकती है।

सुरक्षा नियमों के अनुसार प्रवेश नियंत्रित किया जा सकता है।

जरूरत होने पर लिखित शिकायत की जा सकती है।

लेकिन पत्रकार को रोकने के नाम पर उसके साथ दुर्व्यवहार या हिंसा करना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।

कानून का पालन पत्रकार पर भी लागू होता है और संस्थान पर भी।

डिजिटल युग में प्रमाण ही सबसे बड़ा हथियार

यदि किसी व्यक्ति ने पत्रकारिता के नाम पर अनुचित व्यवहार किया है तो प्रतिक्रिया का सबसे बेहतर तरीका भीड़ इकट्ठा करना या सोशल मीडिया पर तुरंत गाली-गलौज शुरू करना नहीं है।

घटना का वीडियो सुरक्षित करें।

CCTV सुरक्षित रखें।

Visitor Register सुरक्षित रखें।

चैनल का URL सुरक्षित रखें।

तारीख और समय दर्ज करें।

धमकी या दबाव के संदेश सुरक्षित रखें।

और फिर मामले की प्रकृति के अनुसार संस्थान, शिक्षा विभाग, पुलिस, साइबर तंत्र अथवा बाल अधिकार संस्थाओं के समक्ष शिकायत करें।

कानूनी विवाद में शोर से अधिक महत्व प्रमाण का होता है।

Press Council को लेकर भी भ्रम दूर होना चाहिए

हर डिजिटल पत्रकार या YouTube चैनल Press Council of India के statutory jurisdiction में नहीं आता।

इसलिए किसी YouTube वीडियो के मामले में सीधे Press Council को सार्वभौमिक शिकायत मंच मान लेना सही नहीं है।

डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप ने नियमन और जवाबदेही की पुरानी व्यवस्थाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं।

यही कारण है कि भारत में डिजिटल पत्रकारिता के लिए स्पष्ट, संतुलित और अधिकार-सम्मत जवाबदेही व्यवस्था पर गंभीर सार्वजनिक बहस की जरूरत है।

लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाते समय पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर करना भी उतना ही खतरनाक होगा।

असली लड़ाई पत्रकार बनाम संस्थान की नहीं है

आज बहस को “पत्रकार बनाम स्कूल”, “मीडिया बनाम सरकार” या “YouTuber बनाम प्रशासन” के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक लोकतांत्रिक प्रश्न के रूप में देखना होगा।

हम ऐसी पत्रकारिता चाहते हैं जो सवाल पूछे, लेकिन कानून का सम्मान भी करे।

हम ऐसे संस्थान चाहते हैं जो पत्रकारों को सवाल पूछने दें, लेकिन बच्चों और नागरिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करें।

हम ऐसा डिजिटल मीडिया चाहते हैं जो सत्ता से असहज सवाल करे, लेकिन कमजोर व्यक्ति की निजता को अपनी लोकप्रियता का साधन न बनाए।

और हमें ऐसे नागरिक भी चाहिए जो पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा करें, लेकिन कैमरे के नाम पर होने वाली अराजकता को पत्रकारिता का दर्जा न दें।

निष्कर्ष

पत्रकारिता केवल माइक नहीं है।

पत्रकारिता केवल कैमरा नहीं है।

पत्रकारिता केवल प्रेस कार्ड नहीं है।

और पत्रकारिता केवल YouTube चैनल भी नहीं है।

पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है।

सवाल पूछने की जिम्मेदारी।

तथ्य जांचने की जिम्मेदारी।

सत्ता को जवाबदेह बनाने की जिम्मेदारी।

कमजोर की आवाज बनने की जिम्मेदारी।

और सबसे बढ़कर—अपने अधिकारों की सीमा को समझने की जिम्मेदारी।

जिस तरह किसी पुलिस अधिकारी को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं है, उसी तरह पत्रकार भी कानून से ऊपर नहीं है।

मगर इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—किसी पत्रकार को केवल इसलिए धमकाना, रोकना या चुप कराना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता क्योंकि उसने असहज सवाल पूछा है।

लोकतंत्र में दोनों बातें साथ-साथ चलेंगी—

पत्रकार को सवाल पूछने की स्वतंत्रता और नागरिक को कानून द्वारा संरक्षित गरिमा।

यही जिम्मेदार पत्रकारिता है।

क्योंकि अंततः—

स्कूल पत्रकार का स्टूडियो नहीं है।
बच्चे उसका कंटेंट नहीं हैं।
निजता उसकी TRP नहीं है।
कैमरा कानून से ऊपर नहीं है।
और माइक हाथ में होने का अर्थ कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता बचानी है तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता और मर्यादा भी बचानी होगी।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *