‘भारतीय पशुधन के लिए रोग मुक्त भविष्य’
PIB Delhi
राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत 2019 में की गई। यह भारत के सबसे बड़े पशुधन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में से एक है। इसका उद्देश्य देशव्यापी टीकाकरण और निगरानी के माध्यम से खुरपका और मुंहपका रोग (एफएमडी) तथा ब्रूसेलोसिस पर नियंत्रण और इनका उन्मूलन है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत एफएमडी के 147.16 करोड़ टीके लगाए गए जिसका लाभ 8.04 करोड़ किसानों को मिला है। रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि से रोगों के मामले घटाने में काफी मदद मिली है। 2019 में एफएमडी के 132 मामले सामने आए थे जिनकी संख्या 2025 में घट कर 40 हो गई। इसी तरह, ब्रूसेलोसिस के मामले भी 2019 में 22 से घट कर 2025 में 15 हो गए। एनएसपी एंटीबॉडी की मौजूदगी भी 2019 में 20.8 प्रतिशत से घट कर 2025 में 8.1 प्रतिशत रह गई है। इससे साक्ष्य आधारित निगरानी और रोग नियंत्रण की निरंतर कोशिशों के परिणामस्वरूप एफएमडी के प्रसार में कमी आने का संकेत मिलता है। देश में पिछले 3 वर्षों में सीरोटाइप एशिया-1 से उत्पन्न एफएमडी का कोई भी मामला सामने नहीं आया है। इस कार्यक्रम को मजबूत पशु चिकित्सा अवसंरचना, पशुधन के बारे में डिजिटल आंकड़ों, अनुसंधान संस्थानों और वन हेल्थ पहलकदमियों से सहायता मिली है। भारत पशुधन पोर्टल पर 39.00 करोड़ से अधिक मवेशी पंजीकृत हैं। 4019 सचल पशु चिकित्सा इकाइयों ने 136 लाख किसानों को उनके घर पर सेवा मुहैया कराते हुए 276 लाख मवेशियों का इलाज किया है। एनएडीसीपी रोग नियंत्रण, डिजिटल निगरानी और महामारी की तैयारी को समेकित करते हुए भारत में रोगों से सुरक्षित पशुधन क्षेत्र में योगदान कर रहा है।
रोग मुक्त पशुधन क्षेत्र का निर्माण
पशुधन लंबे समय से ग्रामीण भारत में कृषि और संबंधित क्षेत्रों में आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। 2019 की 20वीं पशुधन गणना के अनुसार देश में मवेशियों की कुल संख्या 535.78 करोड़ है जिनमें 302.79 करोड़ गोवंशीय मवेशी हैं। पशुधन की यह बड़ी संख्या पशु स्वास्थ्य और आरोग्य के महत्व को रेखांकित करती है। एफएमडी और ब्रूसेलोसिस जैसे संक्रामक रोगों ने ऐतिहासिक तौर पर दूध उत्पादन में कमी, प्रजनन में विफलता और व्यापार प्रतिबंधों के कारण काफी आर्थिक नुकसान पहुंचाया है।
अत्यंत संक्रामक वायरल रोग एफएमडी गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सुअर जैसे विभाजित खुर वाले पशुओं को प्रभावित करता है। इस रोग से पशु की दूध उत्पादन, विकास, प्रजनन और कार्य क्षमता में गिरावट आती है। एफएमडी का प्रभावी नियंत्रण सभी संवेदनशील पशुओं के नियमित सामूहिक टीकाकरण पर निर्भर करता है।
ब्रूसेला एबॉर्टस बैक्टीरिया से होने वाला ब्रूसेलोसिस गायों और भैंसों का प्रजनन संबंधी रोग है। यह मुख्यतः पशुओं के प्रजनन अंगों को प्रभावित करता है। इससे उनके सामान्य प्रजनन कार्य बाधित होते हैं। यह प्रजनन और दूध देने की क्षमता को बाधित करता है जिससे दुग्ध और मांस उत्पादन प्रभावित होता है। मवेशियों के इस रोग का कोई उपचार नहीं होने की वजह से टीकाकरण ही सबसे प्रभावी और संवहनीय उपाय है।
सरकार ने पशु स्वास्थ्य प्रबंधन को मजबूत करने के लिए सितंबर 2019 में राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) की शुरुआत की। इसका उद्देश्य देशव्यापी टीकाकरण और निगरानी के माध्यम से एफएमडी तथा ब्रूसेलोसिस पर नियंत्रण और इनका उन्मूलन है। इसका लक्ष्य एफएमडी से बचाव के लिए सभी पशुओं का साल में 2 बार 100 प्रतिशत टीकाकरण है। इसके अंतर्गत 4 से 8 माह की बछियों का ब्रूसेलोसिस से बचाव के लिए उनके जीवनकाल में एक बार टीकाकरण किया जाता है।
एनएडीसीपी के अंतर्गत समेकित कार्रवाई के जरिए पशुधन रोगों में कटौती
इस कार्यक्रम का लक्ष्य सभी योग्य पशुओं के साल में 2 बार टीकाकरण से एफएमडी और 4 से 8 महीने की बछियों को जीवनकाल में एक दफा टीका लगा कर ब्रूसेलोसिस को नियंत्रित करना है। यह रोग की निगरानी और शीत श्रृंखला (कोल्ड चैन) लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था में भी मदद करता है।

- प्रभावित होने के अंदेशे वाली सभी गायों और जुगाली करने वाले छोटे पशुओं का एफएमडी के खिलाफ हर 6 महीनों पर सामूहिक टीकाकरण।
- कार्यक्रम के प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन के उद्देश्य से सार्वजनिक जागरूकता और अधिकारियों के लिए अनुकूलन अभियान।
- कान टैगिंग, पंजीकरण और भारत पशुधन पोर्टल पर पशु के संबंध में जानकारियों की अपलोडिंग।
- टीकाकरण के पूर्व और पश्चात नमूना परीक्षण के जरिए सीरो-निगरानी।
- गुणवत्तापूर्ण डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए टीकों और शीत श्रृंखला उपकरणों की खरीद।
- महामारी का निरीक्षण, वायरस पृथकीकरण और उसकी किस्म का निर्धारण तथा क्वारंटाइन और जांच चौकियों के माध्यम से पशुओं की आवाजाही का नियमन।
- लगातार आंकड़ा सृजन, निगरानी और प्रभाव आकलन।
- टीकाकरण कर्मियों को लगाए गए प्रति टीके पर कम-से-कम 3 रुपए की दर से आर्थिक लाभ।
| सीरो-निगरानी और सीरो-निरीक्षणसीरो-निगरानी में रोग की आशंका और प्रतिरोधक क्षमता का अनुमान लगाने के लिए आबादी के स्तर पर एंटीबॉडी की उपस्थिति का आकलन शामिल है। दूसरी ओर, सीरो-निरीक्षण में रोग प्रतिरोधक क्षमता को समझने के लिए एंटीबॉडी स्तरों की दीर्घकालिक ट्रैकिंग पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। |
मवेशियों के स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण के प्रति वित्तीय प्रतिबद्धता
एनएडीसीपी की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, सरकार ने एक अधिक व्यापक और संवहनीय पशु स्वास्थ्य फ्रेमवर्क तैयार करने के लिए ‘पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ (एलएचडीसीपी) के तहत रोग नियंत्रण, पशु चिकित्सा सेवाओं और पशु स्वास्थ्य देखभाल को एकीकृत किया है। संशोधित एलएचडीसीपी के तहत, पशुधन स्वास्थ्य उपायों के एकीकृत कार्यान्वयन और प्रभावी प्रबंधन को सुगम बनाने के लिए एनएडीसीपी, पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण (एलएच&डीसी) घटक तथा ‘पशु औषधि’ पहल को एक ही व्यापक योजना में शामिल कर दिया गया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) का कुल बजट परिव्यय 2,010 करोड़ रुपये है।
एफएमडी और ब्रुसेलोसिस के नियंत्रण में राष्ट्रीय प्रयास और परिणाम
देशभर में निरंतर टीकाकरण, निगरानी और मॉनिटरिंग के प्रयासों के माध्यम से राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत किए गए कार्यों का पैमाना और हासिल हुए मापने योग्य परिणाम निम्नानुसार हैं:

खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी)
एनएडीसीपी के तहत अब तक कुल 147.16 करोड़ एफएमडी वैक्सीन खुराक दी जा चुकी हैं, जिससे 8.04 करोड़ किसानों को लाभ मिला है।
एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले जानवरों में एफएमडी के जोखिम को कम करना
वर्ष 2024 से चरवाहों की भेड़ों और बकरियों के लिए भी एफएमडी टीकाकरण शुरू किया गया है। इस कार्यक्रम में हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और केंद्र शासित प्रदेशों-जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले जानवरों के झुंड शामिल हैं, इसका उद्देश्य बीमारी को फैलने से रोकना है।
प्रतिरक्षा में सुधार और बीमारी के प्रकोप में गिरावट
टीकाकरण के बाद एंटीबॉडी प्रतिक्रिया का आकलन करने के लिए किए गए सेरो-मॉनिटरिंग (रक्त-परीक्षण निगरानी) से पता चलता है कि खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी) वायरस के सेरोटाइप ओ, ए और एशिया 1 के खिलाफ औसत सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा क्रमशः 78.1%, 71.7% और 77.6% है। ये स्तर मजबूत सामूहिक प्रतिरक्षा को दर्शाते हैं। इस बेहतर हुई प्रतिरक्षा के कारण बीमारी के मामलों में भारी गिरावट आई है। रिपोर्ट किए गए एफएमडी के मामलों की संख्या वर्ष 2019 में 132 से घटकर 2025 तक केवल 40 रह गई है। यह देशव्यापी टीकाकरण कवरेज की प्रभावशीलता को दर्शाता है।
| एफएमडी टाइप ओ: भारत और दुनिया के कई हिस्सों में सबसे आम और व्यापक रूप से पाया जाने वाला सेरोटाइप। इसके कारण बार-बार रोग होता है।एफएमडी टाइप ए: एक अत्यधिक परिवर्तनशील सेरोटाइप, जिसका अर्थ है कि यह आसानी से बदलता है और इसके लिए सही तरह से मेल खाने वाले टीकों की ज़रूरत होती है।एफएमडी टाइप एशिया 1: मुख्य रूप से भारत सहित दक्षिण एशिया में पाया जाने वाला एक सेरोटाइप, लेकिन टाइप ओ के मुकाबले यह कम फैला हुआ है। |
ब्रुसेलोसिस
एनएडीसीपी के तहत, 4-8 महीने की आयु की गायों की बछियों को जीवन में एक बार ब्रुसेलोसिस की खुराक दी जाती है।
प्रतिरक्षा में सुधार और बीमारी में गिरावट
वर्ष 2025 में, टीकाकरण के बाद की निगरानी से पता चलता है कि गायों की बछियों में सेरोकनवर्जन दर (टीका लगाए गए जानवरों का वह प्रतिशत जिनमें एंटीबॉडी विकसित होती हैं) 75.63% और भैंस की बछियों में 67.17% दर्ज की गई। ये निष्कर्ष प्रभावी प्रतिरक्षा को दर्शाते हैं, जिससे ब्रुसेलोसिस के मामलों में भारी कमी आई है। रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या 2019 में 22 से घटकर 2025 में 15 रह गई, जो कार्यक्रम के तहत किए गए प्रयासों के सकारात्मक प्रभाव को दर्शाती है।
गोवंशीय मवेशियों की उत्पादकता और दुग्ध उत्पादन में सुधार
देशी और मिश्रित नस्ल के मवेशियों की उत्पादकता: देशी (स्थानीय) और मिश्रित नस्ल के मवेशियों की उत्पादकता 2014-15 में प्रति मवेशी प्रति वर्ष 927 किलोग्राम से बढ़कर 2024-25 में 1,343.2 किलोग्राम हो गई है, जो 44.89% की वृद्धि को दर्शाता है।
भैंस की उत्पादकता: इसी तरह, इसी अवधि के दौरान भैंसों की उत्पादकता प्रति जानवर प्रति वर्ष 1,880 किलोग्राम से बढ़कर 2,365.2 किलोग्राम हो गई है, जो 25.80% की वृद्धि है।
गोवंशीय मवेशियों की उत्पादकता: नतीजतन, भारत में गोवंशीय मवेशियों की औसत उत्पादकता 2014-15 में प्रति जानवर प्रति वर्ष 1,640 किलोग्राम से बढ़कर 2024-25 में 2,250 किलोग्राम हो गई है। यह 36.63% की वृद्धि है और दुनिया भर में किसी भी देश द्वारा दर्ज की गई उत्पादकता में सबसे अधिक वृद्धि है।
दूध उत्पादन में वृद्धि: भारत का दूध उत्पादन 2014-15 में 146.31 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 247.87 मिलियन टन हो गया है। यह पिछले दशक में 69.4% की वृद्धि को दर्शाता है। इस योजना का उद्देश्य मवेशियों की उत्पादकता को और बढ़ाना और 2030 तक प्रति जानवर प्रति वर्ष 3,000 किलोग्राम का औसत दूध उत्पादन हासिल करना है।
बीमारी की रोकथाम के लिए संस्थागत और अवसंरचना से जुड़ी सहायता प्रणालियाँ
अनुसंधान और निगरानी में सहायता
एफएमडी (खुरपका-मुंहपका रोग) और ब्रुसेलोसिस नियंत्रण को मजबूत करने के लिए प्रमुख आईसीएआर संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इस सहायता के अंतर्गत वैक्सीन अनुसंधान, गुणवत्ता परीक्षण, निगरानी, सेरो-सरवैलेंस (रक्त-परीक्षण निगरानी), बीमारी की मॉडलिंग और राज्यवार नमूना संग्रह (सैंपलिंग) शामिल हैं। ये उपाय कार्यक्रम का प्रभावी और विज्ञान-आधारित कार्यान्वयन सुनिश्चित करते हैं।
निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ केंद्रित टीका खरीद
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को टीकाकरण संबंधी सामान खरीदने और कोल्ड-चेन अवसंरचना को मजबूत करने के लिए सहायता प्रदान की जाती है। पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (एएचआईडीएफ) के माध्यम से अलग अलग उद्यमियों, निजी कंपनियों और अन्य पात्र संस्थाओं को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। यह सहायता पशु चिकित्सा टीकों और दवाओं की मेन्युफेक्चरिंग इकाइयों की स्थापना में मदद करती है।
पशु चिकित्सा अवसंरचना और सेवा वितरण
प्रत्येक पशुपालक तक पशु स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करने के लिए पशु चिकित्सा सुविधाओं और मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (एमवीयू) को मजबूत किया जा रहा है। 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 4,019 एमवीयू संचालित हैं। ये टोल-फ्री नंबर 1962 के माध्यम से घर-घर जाकर पशु चिकित्सा सेवाएं प्रदान करती हैं। अब तक, इस पहल से 136 लाख किसानों को लाभ हुआ है और 276 लाख पशुओं का इलाज किया गया है।
भारत पशुधन पोर्टल के माध्यम से डिजिटल एकीकरण
भारत पशुधन पोर्टल पशुधन पंजीकरण, एफएमडी और ब्रुसेलोसिस टीकाकरण डेटा को एक जगह लाता है, जिसमें प्रत्येक पशु को 12 अंकों की एक विशिष्ट टैग आईडी आवंटित की जाती है। जुलाई 2026 तक, पोर्टल पर 39.00 करोड़ से अधिक पशु पंजीकृत किए जा चुके थे। इसने वास्तविक निगरानी, बेहतर ट्रेस करने की क्षमता और पशुधन विकास कार्यक्रमों के अधिक पारदर्शी तथा डेटा-आधारित कार्यान्वयन को सक्षम बनाया है। भविष्य में एआई-सक्षम एनालिटिक्स, टीकाकरण ट्रेसबिलिटी, रीयल-टाइम डैशबोर्ड और साक्ष्य-आधारित योजना बीमारी की निगरानी तथा संसाधनों के आवंटन को और मजबूत कर सकती हैं।
जागरूकता और किसानों की भागीदारी
ग्रामीण भारत में बहुउद्देशीय कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन (एमएआईटीआरआई) के माध्यम से किसानों तक पहुँचने की कोशिशों को मजबूत किया गया है, जो घर-घर जाकर पशु चिकित्सा सेवाएं प्रदान करते हैं। अब तक, वित्तीय सहायता के माध्यम से 39,810 तकनीशियनों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन
‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य की आंतरिक परस्पर निर्भरता को स्वीकार करता है। जानवरों की बीमारियों का जल्दी पता लगाने, निगरानी और नियंत्रण को मजबूत करके, राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम ज़ूनोटिक रोगों (पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियों) के प्रसार के जोखिम को कम करने में योगदान देता है। इसके अतिरिक्त, यह रोगाणुरोधी (एंटीमाइक्रोबियल) दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देता है तथा महामारी समेत सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मौजूदा और भविष्य के खतरों से निपटने के लिए भारत की तैयारी और क्षमता को मज़बूत करता है।
7 जुलाई, 2022 को आयोजित अपनी 21वीं बैठक में, प्रधानमंत्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (पीएम-एसटीआईएसी) ने अंतर-मंत्रालयी प्रयासों के साथ एक ‘राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन’ की स्थापना को मंजूरी दी। यह मिशन देश में मौजूदा सभी ‘वन हेल्थ’ गतिविधियों को समन्वित, समर्थित और एकीकृत करने तथा जहां भी उपयुक्त हो, कमियों को दूर करने का कार्य करेगा।
एनडीडीबी का ब्रुसेलोसिस नियंत्रण मॉडल टीकाकरण, सुरक्षित अपशिष्ट निपटान, मजबूत जैव-सुरक्षा, जन जागरूकता और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय के महत्व पर जोर देकर इसे और मजबूत करता है; विशेष रूप से इसलिए क्योंकि मनुष्यों में ब्रुसेलोसिस का अक्सर पता ही नहीं चल पाता है।
‘वन हेल्थ’ बढ़ती बीमारियों के ख़तरे और तेज़ी से बदलते पर्यावरण के बीच लोगों, जानवरों और इकोसिस्टम की सुरक्षा के लिए एक व्यावहारिक और समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है।

महामारी की तैयारी के लिए पशु स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करना: महामारी कोष परियोजना
2024 में, सरकार ने “महामारी की तैयारी और और उससे निपटने के लिए भारत में पशु स्वास्थ्य सुरक्षा सुदृढ़ीकरण” पर महामारी कोष परियोजना की शुरुआत की। यह जी20 महामारी कोष के सहयोग से चलाई जा रही 25 मिलियन अमरीकी डालर की एक परियोजना है। इस परियोजना को एशियाई विकास बैंक, खाद्य और कृषि संगठन तथा विश्व बैंक की साझेदारी में कार्यान्वित किया जा रहा है।
यह परियोजना महामारी की तैयारी में सुधार के लिए पशु स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करके एनएडीसीपी का पूरक बनती है। यह जीनोमिक और पर्यावरणीय निगरानी सहित रोग निगरानी को बेहतर बनाती है। इसके अतिरिक्त, यह प्रयोगशाला अवसंरचना का उन्नयन करती है और सीमा पार सहयोग को बढ़ावा देती है। इन उपायों से ज़ूनोटिक और सीमा पार पशु रोगों का जल्द पता लगाने और समय पर उसका इलाज करने में सुधार होता है।
इस पहल के तहत, सरकार ने भारत में पशु स्वास्थ्य प्रबंधन को मजबूत करने के उद्देश्य से दो महत्वपूर्ण दस्तावेज़ जारी किए:
- मानक पशु चिकित्सा उपचार दिशानिर्देश (एसवीटीजी): एक व्यापक रूपरेखा जो वैज्ञानिक पशु चिकित्सा पद्धतियों, दवाओं के तर्कसंगत उपयोग और रोगाणुरोधी (एंटीमाइक्रोबियल) प्रबंधन को बढ़ावा देती है। यह रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) पर राष्ट्रीय कार्य योजना का भी समर्थन करता है।
- पशु रोगों के लिए संकट प्रबंधन योजना (सीएमपी): बीमारी के प्रकोप के दौरान तैयारियों को मजबूत करने और तेज़ी से कार्रवाई करने के लिए एक राष्ट्रीय रूपरेखा तैयार की है। यह समय पर रोग के रोकथाम और प्रभावी ढंग से उबरने के उपायों में मदद करती है।
ये दस्तावेज़ पशु चिकित्सकों, नीति निर्माताओं और क्षेत्रीय अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करेंगे। ये पशु स्वास्थ्य संकटों के प्रति समय पर और प्रभावी ढंग से निपटने में मदद करेंगे और बीमारी के प्रबंधन से जुड़े प्रोटोकॉल को भी मज़बूत करेंगे।
भारत के पशुधन संपदा की सुरक्षा
एनएडीसीपी भारत के सबसे व्यापक और डेटा-आधारित पशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों में से एक बनकर उभरा है। निरंतर राष्ट्रव्यापी टीकाकरण, मजबूत निगरानी प्रणालियों, डिजिटल एकीकरण और लक्षित वित्तीय तथा ढांचागत सहायता के माध्यम से, इस कार्यक्रम ने एफएमडी और ब्रुसेलोसिस में मापने योग्य कमी दर्ज की है। बीमारियों के प्रकोप में तेज गिरावट, रेवड़ प्रतिरक्षा में सुधार और गोवंशीय उत्पादकता में स्पष्ट लाभ यह दर्शाते हैं कि बीमारी पर नियंत्रण सीधे तौर पर किसानों के लिए आर्थिक, पोषण संबंधी और आजीविका लाभों में परिवर्तित हो रहा है। पशु रोगों की बीमारियों का जल्द पता चलने से संक्रमण के फैलने का ख़तरा कम होता है, एंटीमाइक्रोबियल स्टीवर्डशिप मज़बूत होती है और भविष्य की ज़ूनोटिक महामारियों के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय तैयारी बेहतर होती है। भविष्य की प्राथमिकताओं में एफएमडी-मुक्त स्थिति के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ तालमेल बिठाना, प्रयोगशाला मान्यता का विस्तार, जीनोमिक निगरानी, एआई-सक्षम बीमारी इंटेलिजेंस, जलवायु-अनुकूल निगरानी प्रणालियां और मजबूत ‘वन हेल्थ’ जैसे प्रयास शामिल हैं।
दुनिया के सबसे बड़े पशुधन टीकाकरण अभियान से लेकर डिजिटल रूप से सक्षम रोग निगरानी तंत्र तक, एनएडीसीपी ने एक स्वस्थ, अधिक उत्पादक और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी पशुधन क्षेत्र बनाने की नींव रखी है। जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत 2047’ की ओर बढ़ रहा है, पशु स्वास्थ्य में निरंतर निवेश खाद्य सुरक्षा, किसानों की समृद्धि और महामारी से निपटने की क्षमता सुनिश्चित करने की दिशा में अहम बना रहेगा।
संदर्भ
मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय
भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय
केबिनेट
विश्व स्वास्थ्य संगठन
