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मांगूंगा नहीं, अपने संघर्ष से हासिल करूंगा!

आत्मसम्मान, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का जीवन-दर्शन

महान कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की कविता का स्मरण होते ही मन में आत्मसम्मान और संघर्ष की भावना जाग उठती है। उनकी रचनाओं में केवल शब्दों का सौंदर्य नहीं, बल्कि जीवन की कठिनाइयों से टकराने का साहस भी दिखाई देता है।

मनुष्य के जीवन में सबसे कठिन समय वह नहीं होता, जब उसके पास संसाधनों की कमी हो। सबसे कठिन समय वह होता है, जब उसे अपनी जरूरतों के लिए अपना स्वाभिमान गिरवी रखने की नौबत आ जाए।

मांगना हमेशा गलत नहीं होता। जरूरतमंद की सहायता करना समाज का दायित्व है और अधिकार मांगना लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने और किसी के सामने अपनी गरिमा खोकर याचना करने में बड़ा अंतर है।

आज हमारा समाज एक अजीब विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर आत्मनिर्भरता की बातें होती हैं, दूसरी ओर व्यवस्था ने आम आदमी को इतनी प्रक्रियाओं, सिफारिशों और दफ्तरों के चक्कर में उलझा दिया है कि अपने ही अधिकार के लिए उसे बार-बार गुहार लगानी पड़ती है।

किसान अपनी फसल का उचित मूल्य मांगता है। युवा रोजगार मांगता है। पत्रकार अपनी स्वतंत्रता और सुरक्षा की मांग करता है। दिव्यांग व्यक्ति सम्मानजनक जीवन और सुविधाओं के लिए आवेदन करता है। पहाड़ का ग्रामीण सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए वर्षों तक इंतजार करता है।

क्या ये सब किसी की कृपा मांग रहे हैं? नहीं! ये अपने अधिकार मांग रहे हैं।

यही वह बिंदु है जहां कविता का आत्मसम्मान वाला भाव सामाजिक और राजनीतिक अर्थ ग्रहण करता है।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश में इस भावना की प्रासंगिकता और भी अधिक है। यहां के लोगों ने अभावों के बीच जीवन जिया है। पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और कमजोर स्थानीय अर्थव्यवस्था के बावजूद पहाड़ का समाज अपने श्रम और संघर्ष से खड़ा रहने की कोशिश कर रहा है।

हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां किसी युवा को रोजगार के लिए सिफारिश न तलाशनी पड़े, किसी बुजुर्ग को पेंशन के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और किसी गरीब परिवार को अपने अधिकार के लिए अधिकारियों के सामने बार-बार हाथ न जोड़ने पड़ें।

लोकतंत्र में सरकार जनता पर उपकार नहीं करती, वह जनता के प्रति जवाबदेह होती है। जनकल्याण कोई एहसान नहीं, शासन की जिम्मेदारी है।

इसलिए ‘मांगूंगा नहीं’ का अर्थ यह नहीं कि हम अन्याय के सामने चुप रहें या अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना छोड़ दें। इसका वास्तविक अर्थ है कि हम अपनी गरिमा बनाए रखते हुए संघर्ष करेंगे, सवाल पूछेंगे और अपने अधिकार लेकर रहेंगे।

आत्मसम्मान का अर्थ अहंकार नहीं है। यह अपने अस्तित्व की पहचान है। यह उस व्यक्ति का संकल्प है जो अभावों में रह सकता है, संघर्ष कर सकता है, असफल हो सकता है, लेकिन अपनी गरिमा से समझौता नहीं करना चाहता।

किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपने हाथों को इतना सक्षम बनाइए कि वे दूसरों का सहारा बन सकें।

यही आत्मनिर्भरता है, यही स्वाभिमान है और यही एक बेहतर समाज की बुनियाद है।

कविता का संदेश अंततः यही प्रेरणा देता है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मनुष्य को अपने आत्मसम्मान और संकल्प की लौ बुझने नहीं देनी चाहिए।


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By udaen

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