₹1,000 की न्यूनतम पेंशन में कैसे चलेगा बुजुर्ग का जीवन?
भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाने की बात करता है। विकास, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सुरक्षा के बड़े लक्ष्य सामने रखे जाते हैं। लेकिन इसी देश के लाखों बुजुर्ग पेंशनर्स के सामने बुढ़ापे में सम्मानजनक जीवन का सवाल खड़ा है।
EPS-95 यानी कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 के तहत न्यूनतम पेंशन वर्तमान में ₹1,000 प्रतिमाह है। केंद्र सरकार ने जुलाई 2025 में राज्यसभा में यह जानकारी दी थी। उसी जवाब में सरकार ने बताया कि न्यूनतम पेंशन बढ़ाने के लिए ट्रेड यूनियनों और जनप्रतिनिधियों सहित विभिन्न पक्षों से अभ्यावेदन प्राप्त हुए हैं।
यहां सवाल सिर्फ ₹1,000 का नहीं है। सवाल है—बुढ़ापे में सामाजिक सुरक्षा का।
आज महंगाई के दौर में ₹1,000 प्रतिमाह से दवा, भोजन, बिजली, आवागमन और दूसरी बुनियादी जरूरतों का खर्च पूरा करना कितना कठिन है, यह उन पेंशनर्स की जिंदगी देखकर समझा जा सकता है जिनकी आय का प्रमुख सहारा यही पेंशन है।
मांग ₹7,500 की, पेंशन ₹1,000
EPS-95 पेंशनर्स संगठनों की प्रमुख मांगों में न्यूनतम पेंशन को ₹7,500 प्रतिमाह करने के साथ महंगाई भत्ता और चिकित्सा सुविधा जैसी मांगें भी रही हैं। संसद में भी ₹7,500 न्यूनतम पेंशन तथा महंगाई भत्ते की मांग का उल्लेख हुआ है।
यह मांग नई नहीं है। वर्षों से पेंशनर्स संगठन सरकार के सामने अपनी समस्याएं रखते रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या किसी बुजुर्ग को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सम्मानजनक पेंशन के लिए आंदोलन करना पड़ना चाहिए?
सरकार के सामने वित्तीय चुनौती भी
इस मुद्दे का दूसरा पक्ष भी समझना जरूरी है। सरकार ने संसद में बताया है कि EPS फंड का 31 मार्च 2019 का बीमांकिक आकलन घाटे की स्थिति दिखाता है। EPS एक अंशदान-आधारित सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था है और सरकार बजटीय सहायता के माध्यम से न्यूनतम ₹1,000 पेंशन सुनिश्चित करती है।
इसलिए समाधान केवल भावनात्मक अपील से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक वित्तीय रूप से टिकाऊ व्यवस्था बनाकर निकालना होगा।
लेकिन वित्तीय चुनौती का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि पेंशनर्स की आवाज अनसुनी कर दी जाए।
उत्तराखंड में भी हजारों पेंशनर्स
EPFO के उपलब्ध पेंशनर डैशबोर्ड के अनुसार उत्तराखंड में 36,158 सुपरएन्युएशन यानी सेवानिवृत्ति पेंशनर्स दर्ज हैं, जिनमें 4,164 को न्यूनतम पेंशन का लाभ मिलता दिखाया गया है।
पहाड़ जैसे राज्यों में बुजुर्गों की स्थिति को केवल आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। महंगे इलाज, आवागमन की समस्या, अकेलेपन और परिवारों के रोजगार के लिए बाहर चले जाने जैसी परिस्थितियां वृद्धावस्था की आर्थिक असुरक्षा को और गंभीर बना सकती हैं।
मोदी सरकार से सीधा सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सामने EPS-95 पेंशनर्स का प्रश्न स्पष्ट है—
क्या न्यूनतम पेंशन को वर्तमान जीवन-यापन की वास्तविक लागत से जोड़ने पर गंभीरता से विचार किया जाएगा?
क्या महंगाई के अनुरूप पेंशन में नियमित वृद्धि की व्यवस्था बनाई जा सकती है?
क्या बुजुर्ग पेंशनर्स के लिए सस्ती अथवा निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यापक व्यवस्था की जा सकती है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या दशकों तक काम कर चुके इन वरिष्ठ नागरिकों को अपने बुढ़ापे के लिए आंदोलन करने के बजाय सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा दी जा सकती है?
यह किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का प्रश्न नहीं होना चाहिए।
यह उन बुजुर्ग नागरिकों का प्रश्न है जिन्होंने अपना कामकाजी जीवन देश की अर्थव्यवस्था को दिया है।
सरकार के पास वित्तीय और नीतिगत चुनौतियां हैं। पेंशनर्स के पास जीवन का अनुभव और अपनी वास्तविक कठिनाइयां हैं। लोकतंत्र की जिम्मेदारी दोनों पक्षों के बीच ऐसा समाधान तलाशना है जो सम्मानजनक भी हो और वित्तीय रूप से टिकाऊ भी।
बुजुर्गों को रोने के लिए मजबूर करने वाली व्यवस्था नहीं, सम्मान से जीने का अधिकार चाहिए।
EPS-95 पेंशनर्स की आवाज को राजनीतिक नारे से आगे ले जाकर सामाजिक सुरक्षा, वृद्ध सम्मान और न्यायपूर्ण पेंशन व्यवस्था के प्रश्न के रूप में देखना होगा।
यही किसी भी कल्याणकारी लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा है।
— संपादकीय
