बाघ रिजर्व क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों का विस्थापन
PIB Delhi
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) को अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों से वंचित करने और सुरक्षा उपायों के संबंध में विशिष्ट शिकायतों की जाँच करने का अधिदेश प्राप्त है, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ हस्तान्तरण, विकास, अत्याचार, वन अधिकार दावे आदि से संबंधित मुद्दे तथा मामला-दर-मामला आधार पर बाघ अभयारण्य क्षेत्रों से अनुसूचित जनजातियों के विस्थापन के मुद्दे सम्मिलित हैं और जहाँ आवश्यक हो, संबंधित प्राधिकारियों को उचित सिफारिशें करता है।
बाघ अभयारण्यों से स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन के संबंध में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) द्वारा कुछ अभ्यावेदन राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को अग्रेषित किए गए हैं। यह स्पष्ट किया गया है कि मूल/संवेदनशील बाघ आवास क्षेत्रों से गाँवों का पुनर्स्थापन वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 2006 की धारा 38 फ (5) के प्रावधानों और वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 4(2) के अनुसार स्वैच्छिक है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 38 ण (1) (ग) के अंतर्गत जारी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (पर्यटन गतिविधियों और प्रोजेक्ट टाइगर के लिए मानक मानदंड) दिशा-निर्देश, 2012 भी सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है, जो स्वैच्छिक पुनर्स्थापन के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है, जिसे समय-समय पर विभिन्न रूपों में सभी राज्य सरकारों के लिए दोहराया गया है।
ग्राम पुनर्स्थापन का क्रियान्वयन संबंधित राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्र प्रशासनों द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जाता है तथा प्रभावी क्रियान्वयन को सुगम बनाने हेतु संबंधित राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों द्वारा जिला-स्तरीय समितियाँ गठित की जाती हैं। इस प्राधिकरण द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन के लिए पुनर्वास पैकेज का प्रावधान है, जिसमें अधिकारों का निपटान, कृषि भूमि और मकान निर्माण आदि की व्यवस्था शामिल है। इस ढाँचे में बुनियादी सुविधाओं का प्रावधान और यह सुनिश्चित करने के लिए अन्य सरकारी योजनाओं के साथ अभिसरण का प्रावधान भी है कि पुनर्स्थापित परिवार कल्याण और विकास लाभों तक पहुँच प्राप्त कर सकें। स्वैच्छिक पुनर्स्थापन के लिए वित्तीय सहायता को 2021 में ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹15 लाख प्रति परिवार कर दिया गया है। जहाँ तक इस मंत्रालय का संबंध है, राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्र प्रशासनों को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है कि कोई भी वैध लाभार्थी अपने वन अधिकारों से वंचित न हो, जिसमें वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) का अनुपालन शामिल है, जो यह निर्धारित करती है कि मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूर्ण होने तक दावेदारों को उनके अधिकृत वन भूमि से बेदखल या हटाया नहीं जा सकता।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने सभी बाघ क्षेत्र राज्यों को स्मरण कराया गया है कि ग्राम पुनर्वास पूर्णतः स्वैच्छिक होगा तथा पुनर्वास कार्य प्रारंभ करने से पूर्व ग्राम सभा और संबंधित लोगों की सूचित सहमति प्राप्त की जाएगी। राज्यों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, वन अधिकार अधिनियम, 2006 और इस प्राधिकरण द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन करने की सलाह दी गई है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 38 ण (1) (ग) के अंतर्गत जारी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (पर्यटन गतिविधियों और प्रोजेक्ट टाइगर के लिए मानक मानदंड) दिशा-निर्देश, 2012 भी सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध हैं, जो स्वैच्छिक पुनर्स्थापन के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं, जिसे समय-समय पर विभिन्न रूपों में सभी राज्य सरकारों के लिए दोहराया गया है। ग्राम सभाओं के साथ परामर्श संबंधित राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है जो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 में निहित पूर्व सूचित सहमति और स्वैच्छिकता को समाविष्ट करते हुए संपूर्ण उचित सावधानी बरतती हैं।
प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, उक्त दिशा-निर्देशों में यह अनुशंसा की गई है कि पुनर्स्थापन प्रक्रिया की निगरानी और क्रियान्वयन दो समितियों अर्थात राज्य-स्तरीय निगरानी समिति एवं जिला-स्तरीय क्रियान्वयन समिति द्वारा किया जा सकता है, जिनमें जनजातीय कल्याण विभाग के प्रतिनिधि भी सम्मिलित हैं। तदनुसार, स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन की निगरानी के लिए एक संस्थागत तंत्र का प्रावधान पहले से ही विद्यमान ढाँचे के अंतर्गत किया गया है तथा संबंधित राज्य सरकारें निर्धारित सांविधिक प्रावधानों और दिशा-निर्देशों के अनुसार पुनर्स्थापन करती हैं। यह सूचित किया जाएगा कि राज्य-स्तरीय निगरानी समितियों और जिला-स्तरीय क्रियान्वयन समितियों द्वारा, जिन्हें प्रक्रिया की निगरानी का अधिदेश प्राप्त है, इस प्राधिकरण को अनैच्छिक या जबरन (बलपूर्वक) पुनर्स्थापन की कोई रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है।
जनजातीय कार्य राज्यमंत्री श्री दुर्गादास उइके ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।
