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संसद की उत्पादकता 19%: लोकतंत्र के लिए यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, चेतावनी है

लोकसभा की उत्पादकता 19 प्रतिशत और राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत रहना महज संसदीय आंकड़ा नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़े एक गंभीर प्रश्न की ओर संकेत करता है—क्या संसद अपने लिए निर्धारित समय का पर्याप्त उपयोग जनता के सवालों, कानून निर्माण और सरकार की जवाबदेही तय करने में कर पा रही है?

संसद लोकतंत्र का वह सर्वोच्च मंच है जहां देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाएं, समस्याएं और असहमति राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनती हैं। सांसद केवल कानून बनाने के लिए नहीं चुने जाते, बल्कि वे सरकार से सवाल पूछने, नीतियों की समीक्षा करने और जनता की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने के लिए भी जिम्मेदार हैं। इसलिए जब संसद की उत्पादकता इतनी कम दिखाई देती है तो चिंता केवल संसद भवन की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती।

संसदीय व्यवधान भारतीय राजनीति में नया नहीं है। विपक्ष के लिए सदन में विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है और सत्ता पक्ष के लिए विधायी एजेंडा आगे बढ़ाना आवश्यक है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विरोध और राजनीतिक टकराव इतना बढ़ जाए कि बहस, प्रश्न और विधायी परीक्षण के लिए निर्धारित समय ही न बच पाए।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन असहमति का सबसे प्रभावी मंच सदन होना चाहिए। यदि सदन में बहस के बजाय लगातार हंगामा हो, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है। दूसरी ओर, यदि सरकार बहुमत के बल पर महत्वपूर्ण विधेयकों को पर्याप्त चर्चा के बिना आगे बढ़ाती है, तो यह भी संसदीय लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

संसद की उत्पादकता को केवल इस आधार पर भी नहीं देखा जाना चाहिए कि कितने विधेयक पारित हुए। कानून बनाना लोकतंत्र की अंतिम मंजिल नहीं है। कानून कितना समझा गया, उस पर कितनी चर्चा हुई, विशेषज्ञों और हितधारकों की राय कितनी सुनी गई और उसके संभावित प्रभावों की कितनी समीक्षा हुई—ये सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यही कारण है कि संसदीय समितियों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। समितियां जटिल विधेयकों और नीतिगत विषयों पर अपेक्षाकृत विस्तार से विचार कर सकती हैं। यदि संसद के भीतर बहस का समय कम हो रहा है, तो समितियों को और मजबूत करना चाहिए।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न जनता से जुड़ा है। सांसदों का समय वास्तव में जनता का समय है। संसद में होने वाला प्रत्येक मिनट सार्वजनिक संसाधन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का हिस्सा है। इसलिए सदन का बाधित होना केवल राजनीतिक दलों के बीच विवाद नहीं है; इसका असर उस नागरिक पर भी पड़ता है जो चाहता है कि उसके क्षेत्र की बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, किसानों की समस्या, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण या बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो।

भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र में संसद की भूमिका और भी बड़ी है। पहाड़ से लेकर समुद्र तक, गांव से लेकर महानगर तक, अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्गों की समस्याएं संसद में पहुंचती हैं। यदि संसद प्रभावी ढंग से काम नहीं करती तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण संवाद तंत्र कमजोर होता है।

इस स्थिति की जिम्मेदारी केवल विपक्ष की नहीं हो सकती और न ही केवल सरकार को दोष देकर समस्या का समाधान होगा। संसद की उत्पादकता सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी है। सरकार को विपक्ष की आवाज सुनने और महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित करने की जरूरत है। विपक्ष को भी विरोध के ऐसे लोकतांत्रिक तरीके अपनाने चाहिए जिनसे सदन की कार्यवाही पूरी तरह ठप न हो।

संसद को चलाने के लिए नियम हैं, लेकिन उससे अधिक जरूरी है संसदीय मर्यादा और राजनीतिक इच्छाशक्ति।

आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद में केवल यह न गिना जाए कि कितने विधेयक पारित हुए, बल्कि यह भी पूछा जाए कि उन पर कितनी सार्थक बहस हुई। कितने प्रश्नों के उत्तर मिले? कितने मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगा गया? कितने विधेयक संसदीय समितियों के पास भेजे गए? और कितने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चर्चा हुई?

19 प्रतिशत और 39 प्रतिशत जैसे आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हमें आईना दिखाते हैं। यह आईना किसी एक दल या सरकार का नहीं, बल्कि पूरे संसदीय लोकतंत्र का है।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब चुने हुए प्रतिनिधि सदन में बैठकर जनता के सवाल पूछते हैं, सरकार जवाब देती है, विपक्ष अपनी बात रखता है और कानून व्यापक चर्चा के बाद बनते हैं।

संसद का समय बर्बाद होना अंततः जनता के विश्वास को कमजोर करता है। इसलिए अब आवश्यकता केवल संसद की उत्पादकता बढ़ाने की नहीं, बल्कि संसदीय संवाद की गुणवत्ता सुधारने की है।

सवाल यह नहीं होना चाहिए कि संसद कितने घंटे चली।

सवाल यह होना चाहिए—जब संसद चली, तब देश के लिए कितना सार्थक काम हुआ?

और यदि लोकसभा की उत्पादकता 19 प्रतिशत तथा राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत है, तो इस सवाल से बचने के बजाय लोकतंत्र को इसका ईमानदार जवाब तलाशना होगा।


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By udaen

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