कोटद्वार का सामाजिक ताना-बाना किसी एक दिन में नहीं बना है। वर्षों से अलग-अलग समुदायों के लोग यहां साथ रहते, कारोबार करते और एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनते आए हैं। यही किसी शहर की वास्तविक ताकत होती है।
ऐसे में यदि भक्ति, आस्था या धार्मिक भावनाओं के नाम पर समाज में अविश्वास और विभाजन की जमीन तैयार की जा रही है, तो यह केवल एक समुदाय का नहीं, पूरे कोटद्वार का नुकसान है।
धर्म मनुष्य को नैतिकता, संयम और करुणा का रास्ता दिखाता है। लेकिन जब धार्मिक भावनाओं को सामाजिक वर्चस्व या भीड़ की उत्तेजना का माध्यम बनाया जाने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह भक्ति है या सत्ता और प्रभाव का विस्तार?
लोकतंत्र में संख्या, धर्म या संगठन की ताकत किसी को कानून और सामाजिक जिम्मेदारी से ऊपर नहीं रखती। बहुसंख्यक हों या अल्पसंख्यक, हर नागरिक की सुरक्षा, गरिमा और समान अधिकार सुनिश्चित करना प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
कोटद्वार को आज नारों से अधिक संयम की जरूरत है, आरोपों से अधिक तथ्यों की और धार्मिक उत्तेजना से अधिक सामाजिक विवेक की।
जो लोग आस्था के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि शहर की शांति किसी की निजी जागीर नहीं है।
कोटद्वार की पहचान किसी एक धर्म से नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों से है जो इसे अपना घर मानते हैं।
भक्ति अगर जोड़ती है तो वह समाज की शक्ति है;
और अगर उसके नाम पर समाज को बांटा जाए, तो सवाल भक्ति पर नहीं—उसके इस्तेमाल पर उठना चाहिए।
