दिव्यांगता प्रमाण पत्र नहीं, सम्मान और अधिकार की गारंटी चाहिए!
विशेष दिव्यांग शिविर अच्छी पहल, लेकिन असली परीक्षा योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने में है।
दिव्यांगजन कल्याण की बात अक्सर सरकारी घोषणाओं और योजनाओं तक सीमित रह जाती है, लेकिन किसी भी संवेदनशील प्रशासन की पहचान इस बात से होती है कि वह समाज के सबसे जरूरतमंद व्यक्ति तक कितनी आसानी से सुविधाएं पहुंचाता है। देहरादून में जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान की पहल पर आयोजित विशेष दिव्यांग शिविर इसी दिशा में एक सराहनीय कदम है। इन शिविरों में 150 दिव्यांगजनों को दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी किए गए। साथ ही सहायक उपकरणों के लिए चिह्नीकरण और यूडीआईडी कार्ड के ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया भी पूरी की गई।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिव्यांगजनों के लिए एक प्रमाण पत्र बनवाना भी कई बार लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया, अस्पतालों के चक्कर और आर्थिक कठिनाइयों का कारण बन जाता है। जिन लोगों को पहले से ही शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उनके लिए सरकारी कार्यालयों की दौड़ किसी अतिरिक्त परीक्षा से कम नहीं होती।
लेकिन सवाल यह है कि क्या 150 प्रमाण पत्र जारी कर देना ही दिव्यांग कल्याण की सफलता है?
वास्तविक चुनौती इसके आगे शुरू होती है। जिन दिव्यांगजनों को सहायक उपकरणों के लिए चिह्नित किया गया है, उन्हें उपकरण कब मिलेंगे? यूडीआईडी पंजीकरण कराने वाले लोगों को पेंशन, छात्रवृत्ति, रोजगार, शिक्षा, परिवहन और अन्य पात्र सरकारी योजनाओं का लाभ कितनी आसानी से मिलेगा? क्या प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि प्रमाण पत्र बनने के बाद लाभार्थियों को अलग-अलग विभागों के चक्कर न लगाने पड़ें?
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के दूरस्थ गांवों में रहने वाले दिव्यांगजनों के सामने स्वास्थ्य सुविधाओं, परिवहन और आर्थिक संसाधनों की सीमाएं हैं। कई परिवारों के लिए दिव्यांग सदस्य को जिला मुख्यालय तक लाना भी बड़ी चुनौती है।
ऐसे में विशेष दिव्यांग शिविरों का विस्तार ब्लॉक, न्याय पंचायत और ग्राम पंचायत स्तर तक होना चाहिए। मोबाइल मेडिकल टीमों के माध्यम से घर के निकट प्रमाण पत्र, यूडीआईडी पंजीकरण और सहायक उपकरणों की पहचान की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
दिव्यांगजन कोई दया के पात्र नहीं, बल्कि समान अधिकार और सम्मान के अधिकारी नागरिक हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 उनके सम्मान, समान अवसर, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी की गारंटी देने का प्रयास करता है।
सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि दिव्यांग कल्याण का मूल्यांकन शिविरों की संख्या या जारी प्रमाण पत्रों से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि कितने लोगों का जीवन वास्तव में आसान हुआ।
देहरादून की यह पहल तभी सार्थक होगी, जब इसका लाभ प्रदेश के अंतिम गांव में बैठे उस दिव्यांग व्यक्ति तक भी पहुंचे, जो आज भी सरकारी सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहा है।
क्योंकि दिव्यांगजन को केवल प्रमाण पत्र नहीं, आत्मनिर्भर जीवन, समान अवसर और सम्मान के साथ जीने का अधिकार चाहिए।
