इंसानियत के लिए पशु प्रेमी होना जरूरी नहीं, संवेदनशील होना जरूरी है!
हम अक्सर इंसानियत, दया और संवेदनशीलता की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन जब सड़क किनारे कोई बेजुबान पशु घायल अवस्था में पड़ा होता है, भूख-प्यास से तड़प रहा होता है या किसी बीमारी से जूझ रहा होता है, तब हमारी संवेदनशीलता की असली परीक्षा होती है।
यह जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति पशु प्रेमी हो। यह भी जरूरी नहीं कि हर किसी के घर में कोई पालतू जानवर हो। लेकिन इतना तो जरूरी है कि हम किसी जीव को दर्द में देखकर अनदेखा न करें।
सवाल यह नहीं है कि हमें पशुओं से कितना प्रेम है, सवाल यह है कि हमारे भीतर कितनी इंसानियत बची है?
सड़क दुर्घटना में घायल गाय, कुत्ता, बंदर या कोई अन्य बेजुबान जीव मदद के इंतजार में घंटों पड़ा रहता है। सैकड़ों लोग उसके पास से गुजरते हैं। कोई फोटो खींचता है, कोई वीडियो बनाता है, कोई सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देता है, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो उसकी मदद के लिए वास्तविक कदम उठाते हैं।
याद रखिए, किसी घायल पशु को उठाना या उसका इलाज करना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है, लेकिन संबंधित हेल्पलाइन तक सूचना पहुंचाना तो संभव है।
उत्तराखंड में पशु हेल्पलाइन नंबर 1962 पर कॉल करके घायल या बीमार पशु के संबंध में सहायता मांगी जा सकती है। जरूरतमंद पशु की स्थिति और स्थान की सही जानकारी देना महत्वपूर्ण है। सेवा की उपलब्धता और प्रतिक्रिया संबंधित क्षेत्र में सुनिश्चित की जानी चाहिए।
सरकार की जिम्मेदारी है कि पशु चिकित्सा सेवाएं केवल कागजों और प्रचार तक सीमित न रहें। हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण हो, एंबुलेंस और पशु चिकित्सा दल पर्याप्त हों तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में इन सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित की जाए।
हमारी भी एक छोटी-सी जिम्मेदारी है। अगली बार सड़क पर कोई बेजुबान घायल या बीमार दिखाई दे तो यह सोचकर आगे मत बढ़ जाइए कि यह मेरा काम नहीं है। बस एक फोन कीजिए।
1962 पर कॉल कीजिए।
क्योंकि इंसानियत का प्रमाण यह नहीं कि हम कितनी बड़ी बातें करते हैं, बल्कि यह है कि किसी असहाय की तकलीफ देखकर हम कितना छोटा-सा कदम उठाते हैं।
याद रखिए, पशु प्रेमी होना आपकी व्यक्तिगत पसंद हो सकती है, लेकिन किसी पीड़ित जीव के प्रति संवेदनशील होना हमारी सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारी है।
इंसान बनना आसान है, इंसानियत निभाना जरूरी है।
