विरासत अभियान की उपलब्धि या अधूरा न्याय? पुश्तैनी जमीन के अधिकार के लिए कब तक इंतजार करेंगे लोग!
उत्तराखंड में जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों की विरासत, परिवार की पहचान और पहाड़ से जुड़े रहने का आधार है। ऐसे में विरासत के नामांतरण के लिए वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर चलाए जा रहे विरासत अभियान के तहत 10,404 प्रकरण दर्ज हुए और इनमें से 4,943 का निस्तारण किया गया। सरकार इसे बड़ी उपलब्धि बता रही है। निश्चित रूप से निर्विवाद संपत्ति हस्तांतरण के मामलों का तेजी से निस्तारण राहत देने वाला कदम है। लेकिन इन आंकड़ों का दूसरा पहलू भी है। कुल दर्ज मामलों में से 5,461 अभी भी लंबित हैं। यानी आधे से अधिक मामलों में लोगों को अभी राहत नहीं मिली है।
17 अक्टूबर 2026 को आयोजित म्यूटेशन डे के आंकड़े बताते हैं कि धारा-33ए के तहत 1,160 मामलों में से 1,108 का निस्तारण हुआ, जबकि धारा-34 के तहत 9,244 मामलों में से केवल 3,835 का निस्तारण हो पाया। सवाल यह है कि जब अभियान का उद्देश्य ही विरासत संबंधी मामलों को सरल और समयबद्ध बनाना है, तो धारा-34 के हजारों मामले अभी तक लंबित क्यों हैं?
पहाड़ में पुश्तैनी जमीन और प्रशासनिक उदासीनता
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जमीन का सवाल मैदानी क्षेत्रों से अलग सामाजिक और आर्थिक महत्व रखता है। यहां परिवारों की कई पीढ़ियां गांवों में रहती आई हैं। रोजगार और शिक्षा के लिए परिवार के सदस्य देहरादून, दिल्ली या दूसरे शहरों में चले गए, लेकिन गांव की पुश्तैनी जमीन आज भी उनकी जड़ों से जुड़ी हुई है।
कई परिवारों में मूल खातेदार की मृत्यु के बाद वारिसों के नाम दर्ज नहीं हो पाते। कहीं परिवार के सदस्य अलग-अलग शहरों में रहते हैं, कहीं दस्तावेजों की कमी है और कहीं राजस्व विभाग की प्रक्रियाएं लोगों के लिए परेशानी बन जाती हैं।
विडंबना यह है कि जिस जमीन पर परिवार का पीढ़ियों से अधिकार और कब्जा है, उसी जमीन के राजस्व अभिलेखों में अपना नाम दर्ज कराने के लिए लोगों को महीनों और वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है।
अभियान केवल आंकड़ों तक सीमित न रहे
सरकार को यह समझना होगा कि किसी प्रकरण को निस्तारित घोषित कर देना ही प्रशासनिक सफलता नहीं है। असली सफलता तब होगी जब वारिसों को अद्यतन खतौनी मिले, राजस्व अभिलेखों में सही नाम दर्ज हो और नागरिक को इसके लिए बार-बार तहसील के चक्कर न लगाने पड़ें।
सरकार को प्रत्येक लंबित मामले की समयसीमा निर्धारित करनी चाहिए। साथ ही यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि कितने मामले दस्तावेजों की कमी, कितने विभागीय देरी और कितने कानूनी विवादों के कारण लंबित हैं।
विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में गांव स्तर पर राजस्व शिविर आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि बुजुर्गों, महिलाओं और बाहर रहने वाले प्रवासी परिवारों को अनावश्यक परेशानी न हो।
जमीन का अधिकार केवल कागजों की प्रक्रिया नहीं
उत्तराखंड में पलायन की चर्चा वर्षों से होती रही है। सरकार गांवों को आबाद रखने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की बात करती है। लेकिन गांव की जमीन के अभिलेख ही व्यवस्थित नहीं होंगे तो उस जमीन पर कृषि, बागवानी, स्वरोजगार और पारिवारिक निवेश की योजनाएं कैसे आगे बढ़ेंगी?
विरासत का नामांतरण केवल राजस्व विभाग की एक औपचारिक कार्रवाई नहीं, बल्कि नागरिक के संपत्ति संबंधी अधिकारों को अभिलेखों में सुरक्षित करने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
मुख्यमंत्री धामी की इस पहल का स्वागत होना चाहिए, लेकिन सरकार को उपलब्धियों के साथ लंबित मामलों की जवाबदेही भी तय करनी होगी।
आखिर सवाल यह है कि 4,943 लोगों को राहत मिलना उपलब्धि है, तो शेष 5,461 लोगों का इंतजार किसकी जिम्मेदारी है?
विरासत अभियान की असली परीक्षा प्रेस विज्ञप्तियों में प्रकाशित आंकड़ों से नहीं, बल्कि उस दिन होगी जब किसी बुजुर्ग को अपने पिता की जमीन अपने नाम दर्ज कराने के लिए तहसील के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। सरकार को विरासत का सम्मान केवल घोषणाओं में नहीं, बल्कि जमीन के अभिलेखों में भी सुनिश्चित करना होगा।
क्योंकि पहाड़ की जमीन सिर्फ जमीन नहीं, आने वाली पीढ़ियों की विरासत है।
