आपके पास कुछ नहीं होगा, फिर भी आप खुश होंगे!
सुविधा के नाम पर स्वामित्व छीनती नई अर्थव्यवस्था और भविष्य के समाज का सवाल
“You will own nothing, and you will be happy.”
अर्थात्, आपके पास अपना कुछ नहीं होगा और आप खुश रहेंगे।
यह महज एक चर्चित अंग्रेजी वाक्य नहीं, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था और समाज की दिशा को लेकर एक गंभीर बहस का प्रतीक बन चुका है। विश्व आर्थिक मंच (WEF) से जुड़ी वर्ष 2016 की एक भविष्यपरक कल्पना और 2017 के वीडियो के बाद यह कथन वैश्विक चर्चा में आया। इसमें ऐसे भविष्य की तस्वीर दिखाई गई, जहां लोग वस्तुओं के मालिक होने के बजाय किराये, सदस्यता और साझा उपयोग के माध्यम से अपनी जरूरतें पूरी करेंगे।
पहली नजर में यह व्यवस्था सुविधाजनक दिखाई देती है। मकान खरीदने की जरूरत नहीं, गाड़ी रखने की जरूरत नहीं, महंगे उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं। मोबाइल पर एक क्लिक और जरूरत की चीज उपलब्ध। लेकिन इस चमकदार सुविधा के पीछे एक बुनियादी सवाल छिपा है—जब व्यक्ति के पास अपना कुछ नहीं होगा, तो उसके जीवन के फैसलों पर अधिकार किसका होगा?
आज दुनिया तेजी से स्वामित्व आधारित अर्थव्यवस्था से उपयोग आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है। मनोरंजन के लिए सदस्यता, डिजिटल सेवाओं के लिए मासिक भुगतान, वाहन के लिए किराया, सॉफ्टवेयर के लिए लाइसेंस और मकान के लिए किरायेदारी। धीरे-धीरे व्यक्ति वस्तुओं का मालिक कम और सेवाओं का उपभोक्ता अधिक बनता जा रहा है।
यह बदलाव अपने आप में गलत नहीं है। साझा संसाधनों का उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और अनावश्यक उपभोग में कमी अच्छी पहल हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है, जब सुविधा के नाम पर व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता और संसाधनों पर उसका नियंत्रण कमजोर होने लगे।
आज एक आम आदमी जीवनभर मेहनत करके मकान बनाता है, जमीन खरीदता है, दुकान स्थापित करता है और अपनी अगली पीढ़ी के लिए संपत्ति छोड़ना चाहता है। उसकी बचत का सबसे बड़ा उद्देश्य आर्थिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता है। लेकिन यदि भविष्य में जमीन, मकान, परिवहन, डिजिटल संसाधन और आवश्यक सेवाओं का नियंत्रण कुछ बड़ी कंपनियों या संस्थाओं के पास केंद्रित हो गया, तो आम आदमी की स्थिति क्या होगी?
जिसके पास संपत्ति है, उसके पास संकट के समय विकल्प होते हैं। जिसके पास केवल किराये की सुविधा है, उसे हर महीने भुगतान करना होगा। भुगतान की क्षमता समाप्त होते ही सुविधा भी समाप्त हो सकती है।
यहां सवाल केवल मकान या गाड़ी का नहीं है। सवाल आर्थिक सत्ता के केंद्रीकरण का है। क्या भविष्य का नागरिक स्वतंत्र उपभोक्ता होगा या कंपनियों की शर्तों पर जीवन जीने वाला निर्भर ग्राहक?
भारत और उत्तराखंड के संदर्भ में यह बहस और भी महत्वपूर्ण है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पहचान, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा का आधार है। पहाड़ का किसान अपनी थोड़ी-सी जमीन से परिवार का भविष्य जोड़ता है। गांव का छोटा उद्यमी अपनी दुकान और कार्यस्थल से रोजगार पैदा करता है। यदि स्थानीय समुदायों का संसाधनों पर नियंत्रण कमजोर हुआ और अर्थव्यवस्था पूरी तरह बाहरी पूंजी तथा बड़े प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो गई, तो पलायन और आर्थिक असमानता की समस्या और गंभीर हो सकती है।
हमें यह भी समझना होगा कि हर व्यक्ति को मकान, वाहन या महंगी वस्तुओं का मालिक बनाना जरूरी नहीं है, लेकिन हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन, संसाधनों तक न्यायपूर्ण पहुंच और अपनी जरूरतों पर निर्णय लेने का अधिकार अवश्य मिलना चाहिए।
तकनीक का उद्देश्य मनुष्य को स्वतंत्र बनाना होना चाहिए, उसे किसी कंपनी की सदस्यता और भुगतान व्यवस्था का स्थायी ग्राहक बनाना नहीं। विकास का पैमाना यह नहीं हो सकता कि लोगों के पास कितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं। असली पैमाना यह है कि उन सुविधाओं पर उनका कितना अधिकार और नियंत्रण है।
खुशी खरीदी या किराये पर ली जा सकने वाली वस्तु नहीं है।
हो सकता है भविष्य में दुनिया ऐसी हो जहां लोग बहुत कम वस्तुओं के मालिक हों और अधिक सुविधाओं का उपयोग करें। लेकिन यह सुनिश्चित करना समाज और सरकार की जिम्मेदारी है कि इस बदलाव का लाभ केवल बड़ी कंपनियों को न मिले और आम नागरिक अपनी आर्थिक स्वतंत्रता न खो दे।
आखिरकार, हमें ऐसी दुनिया नहीं चाहिए जहां हर चीज उपलब्ध तो हो, लेकिन किसी चीज पर हमारा अधिकार न हो।
क्योंकि सुविधा के सहारे जीवन चल सकता है, लेकिन स्वतंत्रता के बिना जीवन का अर्थ अधूरा है।
— संपादकीय
