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UNN : संपादकीय: उत्तराखंड में रॉक फॉस्फेट की नीलामी—विकास का अवसर, लेकिन हिमालय की कीमत पर नहीं

केंद्र सरकार ने क्रिटिकल और स्ट्रैटेजिक मिनरल्स की आठवीं ट्रांच में उत्तराखंड के Kathyur Rock Phosphate Block को भी शामिल किया है। पहली नजर में यह एक सामान्य खनन परियोजना लग सकती है, लेकिन इसके मायने इससे कहीं अधिक व्यापक हैं। यह फैसला केवल एक खनिज ब्लॉक की नीलामी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के विकास मॉडल की भी परीक्षा है।

रॉक फॉस्फेट फॉस्फेट उर्वरकों का प्रमुख कच्चा माल है। भारत अपनी बड़ी जरूरत आयात से पूरी करता है। यदि देश में इसका उत्पादन बढ़ता है तो विदेशी निर्भरता कम होगी, किसानों को स्थिर आपूर्ति मिल सकती है और कृषि क्षेत्र को मजबूती मिलेगी। इस दृष्टि से यह पहल राष्ट्रीय हित में महत्वपूर्ण है।

लेकिन उत्तराखंड कोई सामान्य भूभाग नहीं है। यह हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी, गंगा-यमुना जैसी नदियों के उद्गम क्षेत्र और लाखों लोगों के जल स्रोतों का आधार है। यहां विकास की हर परियोजना का असर केवल एक जिले तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि इस नीलामी को केवल राजस्व और निवेश के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यदि भविष्य में विस्तृत अन्वेषण के बाद खनन शुरू होता है, तो सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जंगल, जल स्रोत, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के अधिकार सुरक्षित रहें। उत्तराखंड पहले ही जोशीमठ धंसाव, भूस्खलन, अतिवृष्टि और अनियोजित विकास की चुनौतियों का सामना कर चुका है। ऐसे अनुभव बताते हैं कि पर्यावरणीय चेतावनियों की अनदेखी की कीमत बहुत महंगी पड़ सकती है।

साथ ही, यह भी जरूरी है कि स्थानीय लोगों को केवल दर्शक न बनाया जाए। रोजगार, कौशल विकास, रॉयल्टी का न्यायसंगत उपयोग और प्रभावित क्षेत्रों के विकास की स्पष्ट नीति हो। यदि खनिज उत्तराखंड की धरती से निकले, तो उसका लाभ भी सबसे पहले उत्तराखंड के लोगों तक पहुँचना चाहिए।

सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति केवल औपचारिक प्रक्रिया न बने। स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन, पारदर्शिता और जनभागीदारी इस प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा हों। हिमालय में विकास का अर्थ केवल खनन नहीं, बल्कि प्रकृति और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करना है।

उत्तराखंड के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि खनिज निकाले जाएं या नहीं, बल्कि यह है कि यदि निकाले जाएं तो कैसे? यदि विकास वैज्ञानिक, पारदर्शी और पर्यावरण-अनुकूल होगा, तो यह राज्य और देश दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है। लेकिन यदि अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए हिमालय की संवेदनशीलता को नजरअंदाज किया गया, तो उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।

उत्तराखंड का भविष्य केवल उसके खनिजों में नहीं, बल्कि उसके जंगलों, नदियों और पहाड़ों की सुरक्षा में भी निहित है। यही संतुलन इस नीलामी की वास्तविक सफलता तय करेगा।


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By udaen

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