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“यदि विकास की कीमत स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल, हरे-भरे जंगल और स्वस्थ जीवन है, तो यह विकास नहीं, भविष्य से समझौता है।”

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (Environmental Performance Index–EPI) 2026 में भारत का 177 देशों में 176वें स्थान पर होना केवल एक अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह सच है कि भारत सरकार लंबे समय से EPI की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती रही है। सरकार का तर्क है कि यह सूचकांक विकासशील देशों की वास्तविक परिस्थितियों, जनसंख्या के दबाव और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं देता। इस तर्क में कुछ आधार हो सकता है, लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदल जाता कि देश के करोड़ों लोग आज भी प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, अनेक नदियाँ प्रदूषण से जूझ रही हैं और जंगलों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।

आज भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। आधुनिक सड़कें, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, रेलवे, सुरंगें और शहरी विस्तार विकास के प्रतीक माने जा रहे हैं। लेकिन यदि इसी विकास के साथ पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, नदियों का दोहन, पहाड़ों का क्षरण और जैव विविधता का विनाश भी बढ़ रहा हो, तो यह संतुलित विकास नहीं कहा जा सकता।

उत्तराखंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। चारधाम सड़क परियोजना, सुरंग निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएँ और अनियोजित शहरीकरण ने विकास के नए अवसर तो दिए हैं, लेकिन भूस्खलन, भू-धंसाव, जंगलों की कटाई और जल स्रोतों के सूखने जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। जो हिमालय करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है, वही आज जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप के दोहरे दबाव का सामना कर रहा है।

सवाल यह नहीं है कि भारत की रैंकिंग सही है या गलत। असली सवाल यह है कि क्या हमारे शहरों की हवा पहले से अधिक स्वच्छ हुई है? क्या हमारी नदियाँ प्रदूषण मुक्त हैं? क्या हर विकास परियोजना में पर्यावरणीय प्रभाव का ईमानदारी से मूल्यांकन हो रहा है? क्या स्थानीय समुदायों की आवाज़ को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त महत्व मिल रहा है? इन प्रश्नों के उत्तर हमें अपनी नीतियों की वास्तविक सफलता बताएँगे।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नवीकरणीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य घोषित किए हैं। ये सराहनीय कदम हैं, लेकिन केवल लक्ष्य घोषित करना पर्याप्त नहीं है। ज़रूरत है कि प्रदूषण नियंत्रण कानूनों का सख्ती से पालन हो, पर्यावरणीय स्वीकृतियों में पारदर्शिता हो, अवैध खनन और वनों की कटाई पर प्रभावी रोक लगे तथा शहरों और गाँवों में कचरा प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए।

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। उद्योगों, स्थानीय निकायों, न्यायपालिका, वैज्ञानिक संस्थानों, मीडिया और आम नागरिकों की भी समान भूमिका है। यदि हर नागरिक जल संरक्षण, वृक्षारोपण, प्लास्टिक के कम उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को अपनी जिम्मेदारी समझे, तो बदलाव संभव है।

रैंकिंग बदलने से अधिक महत्वपूर्ण है ज़मीनी बदलाव। भारत को ऐसी विकास नीति अपनानी होगी जिसमें आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बनें। आने वाली पीढ़ियाँ हमसे केवल ऊँची इमारतें और चौड़ी सड़कें नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल, हरे-भरे जंगल और रहने योग्य पृथ्वी भी विरासत में चाहेंगी।

यही समय है जब भारत को यह तय करना होगा कि वह केवल आर्थिक महाशक्ति बनेगा या पर्यावरणीय नेतृत्व का भी उदाहरण प्रस्तुत करेगा। क्योंकि अंततः प्रकृति से संघर्ष में कोई भी राष्ट्र विजेता नहीं बन सकता।


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By udaen

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