संपादकीय
एक पेड़ पर कार्रवाई, हजारों पेड़ों पर चुप्पी! क्या पर्यावरण का कानून केवल आम आदमी के लिए है?
उत्तराखंड की पहचान केवल उसकी देवभूमि होने से नहीं है। उसकी असली पहचान उसके जंगल, नदियाँ, पहाड़ और जैव विविधता हैं। यही कारण है कि इस राज्य में एक पेड़ का महत्व केवल लकड़ी के मूल्य से नहीं, बल्कि जल स्रोतों, मिट्टी के संरक्षण, वन्यजीवों और स्थानीय जलवायु से जुड़ा हुआ है।
इसी उत्तराखंड में यदि कोई व्यक्ति अपने घर के निर्माण या निजी उपयोग के लिए बिना अनुमति एक पेड़ काट दे, तो वन विभाग तत्काल सक्रिय हो जाता है। मुकदमा दर्ज होता है, जुर्माना लगाया जाता है और कानून का कठोर अनुपालन दिखाई देता है। कानून का पालन होना चाहिए और इसमें कोई दो राय नहीं है।
लेकिन यही कानून तब सवालों के घेरे में आ जाता है, जब बड़ी विकास परियोजनाओं के लिए हजारों पेड़ों की कटाई होती है।
देहरादून–ऋषिकेश मार्ग के सात मोड़ (7 मोड़) परियोजना को लेकर हजारों पेड़ों के कटान की खबरों ने पूरे उत्तराखंड में एक नई बहस छेड़ दी है। विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों में इस परियोजना से लगभग 3,000 से 4,000 पेड़ों के प्रभावित होने या कटान की अनुमति दिए जाने की चर्चा है। यदि यह सही है, तो जनता का पहला अधिकार है कि उसे पूरी जानकारी मिले।
सरकार को बताना चाहिए—
- कुल कितने पेड़ काटे जा रहे हैं?
- प्रत्येक पेड़ की प्रजाति क्या है?
- कितने पेड़ वास्तव में काटे जाएंगे और कितनों का प्रत्यारोपण संभव है?
- परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति किन शर्तों के साथ दी गई?
- प्रतिपूरक वनीकरण कहाँ होगा?
- लगाए जाने वाले पौधों की निगरानी कौन करेगा?
- पाँच और दस वर्ष बाद उनकी जीवित रहने की दर क्या होगी?
दुर्भाग्य से भारत में प्रतिपूरक वनीकरण का सबसे बड़ा संकट यही है कि कागजों में लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन कुछ वर्षों बाद उनका अस्तित्व खोजने पर भी नहीं मिलता। यदि एक शताब्दी पुराने वृक्ष के बदले दस पौधे लगाए भी जाएँ, तो क्या वे अगले कई दशकों तक उसी पारिस्थितिक भूमिका का निर्वहन कर पाएँगे? उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
उत्तराखंड पहले ही अनियोजित विकास, भूस्खलन, बादल फटने की घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव झेल रहा है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में किसी भी बड़े निर्माण से पहले पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐसे में प्रत्येक बड़ी परियोजना पर प्रश्न उठाना विकास विरोध नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता का परिचायक है।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि सार्वजनिक बहस तथ्यों पर आधारित हो। यदि परियोजना के लिए विधिवत वन एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ प्राप्त की गई हैं और सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन हुआ है, तो सरकार को यह जानकारी सक्रिय रूप से सार्वजनिक करनी चाहिए। पारदर्शिता से ही अविश्वास कम होगा।
असल प्रश्न पेड़ों की संख्या का नहीं, बल्कि कानून की समानता का है।
क्या कानून केवल उस किसान, मजदूर या मध्यमवर्गीय परिवार के लिए कठोर है, जो एक पेड़ काटने पर अभियोजन झेलता है? या वही कानून बड़ी परियोजनाओं पर भी समान गंभीरता से लागू होता है? यदि नियम सभी के लिए समान हैं, तो जवाबदेही भी सभी की समान होनी चाहिए।
उत्तराखंड वही भूमि है जहाँ चिपको आंदोलन ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया था कि जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। आज उसी राज्य में यदि हजारों पेड़ों की कटाई हो रही है, तो सरकार की जिम्मेदारी केवल सड़क बनाना नहीं, बल्कि जनता के हर प्रश्न का तथ्यात्मक और दस्तावेज़ी उत्तर देना भी है।
विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। लेकिन विकास तभी टिकाऊ कहलाएगा, जब वह प्रकृति का सम्मान करे, वैज्ञानिक मानकों का पालन करे और जनता के विश्वास को साथ लेकर चले।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि सड़क कितनी चौड़ी बनी, बल्कि यह होता है कि निर्णय कितने पारदर्शी, उत्तरदायी और न्यायपूर्ण थे।
