संपादकीय
कम्प्यूटर पहुँचे, इंटरनेट नहीं: क्या उत्तराखंड में शिक्षा केवल घोषणाओं के भरोसे है?
उत्तराखंड को शिक्षा और मानव संसाधन के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाने के दावे वर्षों से किए जाते रहे हैं। हर बजट में डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लास, आधुनिक विद्यालय और नई तकनीक की बातें होती हैं। लेकिन जब वास्तविक तस्वीर सामने आती है, तो सवाल उठता है—क्या सरकार स्कूलों का आधुनिकीकरण कर रही है या केवल आंकड़ों का?
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था का एक ऐसा आईना है, जिसे देखकर सरकार को असहज होना चाहिए। रिपोर्ट बताती है कि 4,419 स्कूलों में कम्प्यूटर तो पहुँचा दिए गए, लेकिन इंटरनेट नहीं है। यह वैसा ही है जैसे किसी को कार दे दी जाए, लेकिन सड़क ही न बनाई जाए।
डिजिटल इंडिया का सपना केवल कम्प्यूटर खरीद लेने से पूरा नहीं होता। डिजिटल शिक्षा का आधार है—बिजली, इंटरनेट, प्रशिक्षित शिक्षक और तकनीकी सहायता। यदि इनमें से कोई एक भी कड़ी कमजोर है, तो पूरा ढांचा केवल दिखावा बनकर रह जाता है।
रिपोर्ट का दूसरा चिंताजनक तथ्य है कि 1,938 स्कूलों में कम्प्यूटर उपयोग में ही नहीं हैं। यह केवल मशीनों की बर्बादी नहीं, बल्कि जनता के टैक्स के पैसे का भी सवाल है। करोड़ों रुपये खर्च कर उपकरण खरीद लेना आसान है, लेकिन उन्हें बच्चों की पढ़ाई से जोड़ना प्रशासन की असली परीक्षा होती है।
सबसे बड़ा संकट शिक्षकों का है। 2,655 विद्यालय आज भी एकल शिक्षक व्यवस्था पर चल रहे हैं। एक शिक्षक प्रधानाध्यापक भी है, क्लर्क भी, चुनाव ड्यूटी भी करता है, सरकारी सर्वे भी भरता है और बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी उसी पर है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा करना वास्तविकता से आँखें मूँदने जैसा होगा।
यदि 362 स्कूलों में बिजली तक नहीं है, तो डिजिटल शिक्षा के दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं? यदि 542 विद्यालयों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं हैं, तो “बेटी पढ़ाओ” का नारा कितना प्रभावी रह जाएगा? और यदि 15 प्रतिशत विद्यालयों में खेल मैदान नहीं हैं, तो नई शिक्षा नीति में समग्र विकास की अवधारणा कैसे लागू होगी?
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियाँ कठिन हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में स्कूलों तक संसाधन पहुँचाना आसान नहीं है। लेकिन यही वह कारण है कि योजनाएँ ज़मीन पर अधिक गंभीरता से लागू होनी चाहिए थीं। दुर्भाग्य से कई बार प्राथमिकता निर्माण कार्यों और उपकरणों की खरीद तक सीमित रह जाती है, जबकि रखरखाव, मानव संसाधन और संचालन पीछे छूट जाते हैं।
यह केवल सरकार की आलोचना का विषय नहीं है। यह पूरे समाज के भविष्य का प्रश्न है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। यदि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलेगी, तो सामाजिक और आर्थिक असमानता और बढ़ेगी।
अब समय केवल नई घोषणाओं का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। सरकार को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए—
- जिन विद्यालयों में इंटरनेट नहीं है, वहाँ सुविधा कब तक पहुँचेगी?
- एकल शिक्षक विद्यालयों में नियुक्तियाँ कब होंगी?
- कम्प्यूटरों के उपयोग की निगरानी कौन करेगा?
- बिजली, शौचालय और खेल मैदान जैसी मूलभूत सुविधाओं का लक्ष्य कब तक पूरा होगा?
शिक्षा किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि विद्यालय केवल कागज़ों पर डिजिटल होंगे और बच्चे आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ इसकी कीमत चुकाएँगी।
उत्तराखंड को स्मार्ट स्कूलों की नहीं, सक्षम स्कूलों की जरूरत है। कम्प्यूटर से पहले व्यवस्था को ऑनलाइन करना होगा। क्योंकि शिक्षा केवल बजट की मद नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य की नींव है।
