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परेड ग्राउंड के नीचे पार्किंग: समाधान या भविष्य की नई चुनौती?

देहरादून के दिल में स्थित परेड ग्राउंड के नीचे डबल बेसमेंट अंडरग्राउंड पार्किंग बनाने और उसके ऊपर गांधी पार्क व परेड ग्राउंड को मिलाकर एक विशाल हरित क्षेत्र विकसित करने की योजना पहली नजर में आकर्षक लगती है। शहर बढ़ रहा है, वाहन बढ़ रहे हैं और पार्किंग की समस्या गंभीर है। ऐसे में आधुनिक पार्किंग अवसंरचना की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन हर बड़ी परियोजना की तरह इस योजना का मूल्यांकन भी केवल उसके आकर्षक चित्रों और प्रस्तुतियों से नहीं, बल्कि कठिन सवालों से होना चाहिए।

सबसे पहला सवाल है—क्या देहरादून की समस्या वास्तव में पार्किंग की कमी है, या अनियोजित शहरीकरण? यदि शहर में हर वर्ष हजारों नए वाहन जुड़ते रहेंगे, सार्वजनिक परिवहन कमजोर रहेगा, फुटपाथ अतिक्रमण से घिरे रहेंगे और सड़कें वही रहेंगी, तो नई पार्किंग कितने वर्षों तक पर्याप्त साबित होगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ वर्षों बाद यह डबल बेसमेंट भी छोटा पड़ जाए?

दूसरा सवाल पर्यावरण का है। सरकार ने आश्वासन दिया है कि पार्किंग के ऊपर कोई नया स्थायी निर्माण नहीं होगा और पूरा क्षेत्र हरित पार्क के रूप में विकसित किया जाएगा। यह स्वागतयोग्य घोषणा है, लेकिन जनता केवल आश्वासन नहीं, कानूनी सुरक्षा चाहती है। क्या भविष्य में कोई सरकार या एजेंसी इस खुले क्षेत्र का व्यावसायिक उपयोग नहीं करेगी? क्या इसे स्थायी रूप से सार्वजनिक हरित क्षेत्र घोषित किया जाएगा?

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न भूगर्भीय सुरक्षा का है। देहरादून एक संवेदनशील दून घाटी में स्थित है, जहाँ भूजल, वर्षाजल निकासी और मिट्टी की प्रकृति अत्यंत महत्वपूर्ण है। दो मंजिला भूमिगत निर्माण से पहले स्वतंत्र भू-वैज्ञानिक अध्ययन, जल निकासी की वैज्ञानिक योजना और पर्यावरणीय प्रभाव का सार्वजनिक आकलन होना चाहिए। यदि बरसात के मौसम में जलभराव या भूजल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, तो इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है।

इतिहास भी हमें सावधान करता है। कई शहरों में बड़ी-बड़ी शहरी परियोजनाएँ समय पर पूरी नहीं हुईं, लागत कई गुना बढ़ी और जनता वर्षों तक निर्माणाधीन सड़कों, धूल और जाम से जूझती रही। इसलिए इस परियोजना की समयसीमा, लागत, तकनीकी रिपोर्ट और निगरानी व्यवस्था पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक की जानी चाहिए।

यह भी विचारणीय है कि क्या शहर के केंद्र में निजी वाहनों के लिए और अधिक पार्किंग बनाना दीर्घकालिक समाधान है, या फिर सार्वजनिक परिवहन, पार्क-एंड-राइड प्रणाली, इलेक्ट्रिक बसों, साइकिल ट्रैक और पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित मार्ग विकसित करना अधिक टिकाऊ विकल्प होगा? आधुनिक शहर केवल कारों के लिए नहीं, लोगों के लिए बनाए जाते हैं।

फिर भी यदि यह परियोजना पूरी पारदर्शिता, पर्यावरणीय मानकों और नागरिक सहभागिता के साथ लागू होती है, तो यह देहरादून के लिए एक मॉडल परियोजना बन सकती है। लेकिन यदि यह केवल कंक्रीट का विस्तार बनकर रह गई, तो शहर एक और हरित अवसर खो देगा।

देहरादून को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो उसकी प्राकृतिक पहचान, जल संसाधनों और सार्वजनिक स्थानों को बचाए। शहर की आत्मा केवल उसकी सड़कों में नहीं, बल्कि उसके खुले मैदानों, पेड़ों और स्वच्छ हवा में बसती है।

सरकार के सामने चुनौती केवल पार्किंग बनाने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की है कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। यदि यह संतुलन बना, तो परेड ग्राउंड की यह परियोजना इतिहास लिखेगी; यदि नहीं, तो यह भी अधूरी शहरी योजनाओं की लंबी सूची में एक नया नाम बन जाएगी।


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By udaen

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