जब सरकार वोटर चुनने लगे तो चुनाव नहीं, लोकतंत्र का श्राद्ध होता है
उत्तराखंड देवभूमि है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रयोगभूमि भी बनती जा रही है। कभी भू-कानून पर जनता सड़क पर है, कभी बेरोजगार भर्ती परीक्षाओं में धांधली का आरोप लगाते हैं, कभी पलायन गांवों को खाली कर देता है और अब यदि मतदाता सूची को लेकर भी लोगों के मन में संदेह पैदा होने लगे, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना तब शुरू होती है, जब सरकारें जनता की पसंद बनने के बजाय जनता को ही अपनी पसंद के अनुसार ढालने लगती हैं। जिस व्यवस्था में वोटर सरकार चुनने के बजाय सरकार ही तय करती हुई दिखाई दे कि कौन वोट देगा और कौन नहीं, वहाँ चुनाव लोकतंत्र का उत्सव नहीं, सत्ता का प्रायोजित कार्यक्रम बन जाता है।
विडंबना देखिए—पहाड़ों के गांव खाली हो रहे हैं, लेकिन चुनावी गणित कभी खाली नहीं होता। युवाओं को रोजगार नहीं मिलता, किसानों को उचित दाम नहीं मिलता, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं मिलते, स्कूलों में शिक्षक नहीं मिलते; लेकिन चुनाव आते ही हर वोट का हिसाब-किताब अचानक सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाता है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान कराना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि हर पात्र नागरिक बिना भय, भेदभाव और प्रशासनिक मनमानी के अपना मताधिकार प्रयोग कर सके। यदि मतदाता सूची से नाम हटने, जुड़ने या संशोधन की प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कमजोर होता है, तो यह केवल चुनाव आयोग या सरकार का नहीं, पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का प्रश्न बन जाता है।
उत्तराखंड के लोगों ने राज्य इसलिए नहीं बनाया था कि जनता की आवाज़ फाइलों में दब जाए और चुनाव केवल आँकड़ों का खेल बनकर रह जाएँ। यह वही प्रदेश है जिसने जनआंदोलनों से अपनी पहचान बनाई। यहाँ जनता को केवल मतदाता नहीं, राज्य निर्माण की भागीदार माना गया था।
सत्ता का अहंकार हमेशा यह मान लेता है कि जनता भूल जाएगी। लेकिन इतिहास गवाह है—जनता देर से फैसला करती है, गलत फैसला नहीं करती। लोकतंत्र में सरकारें पाँच साल के लिए आती हैं, लेकिन मतदाता लोकतंत्र का स्थायी मालिक होता है।
यदि कभी ऐसा समय आ जाए कि जनता को अपने ही वोट के अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि खतरा किसी एक दल या सरकार पर नहीं, बल्कि संविधान की उस आत्मा पर है जिसने लिखा था—“हम भारत के लोग…”; “हम भारत की सरकार” नहीं।
लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी वोट माँगना है, वोटर चुनना नहीं। जिस दिन यह सीमा टूट जाएगी, उस दिन लोकतंत्र का उत्सव नहीं, उसका श्राद्ध मनाया जाएगा।
