BRICS की नई मुद्रा का सपना और भारत की मौद्रिक संप्रभुता का सवाल
दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन एक बार फिर दुनिया की आर्थिक व्यवस्था पर बहस को तेज करने वाला है। चर्चा फिर वही है—क्या BRICS अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देगा? क्या 11 सदस्य देशों के बीच कोई साझा BRICS मुद्रा सामने आएगी? और अगर ऐसी मुद्रा बनी तो उसका सबसे बड़ा लाभार्थी कौन होगा—चीन या भारत?
इन सवालों का जवाब भावनाओं से नहीं, आर्थिक वास्तविकताओं से तलाशना होगा।
BRICS आज एक महत्वपूर्ण आर्थिक और राजनीतिक समूह है। लेकिन उसके भीतर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है, दोनों देशों के व्यापार में भारी असंतुलन है और दोनों की रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। दूसरी ओर, Saudi Arabia और Iran जैसे देशों के बीच भी लंबे समय से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है।
ऐसे में 11 देशों की एक साझा मुद्रा बनाना केवल नोट छापने या उसका नाम तय करने का मामला नहीं होगा। यह सवाल इससे कहीं बड़ा होगा कि उस मुद्रा की मौद्रिक नीति कौन तय करेगा? ब्याज दर कौन निर्धारित करेगा? मुद्रा आपूर्ति पर नियंत्रण किसका होगा? संकट के समय किस देश को कितना समर्थन मिलेगा?
यहीं भारत के लिए सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।
भारत अपनी मौद्रिक नीति का नियंत्रण किसी दूसरे देश, विशेषकर चीन, को सौंपने की स्थिति में नहीं होगा। यदि साझा मुद्रा की निर्णय-प्रक्रिया में आर्थिक आकार के आधार पर चीन का प्रभाव अत्यधिक बढ़ता है, तो वह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के अनुकूल नहीं होगी।
इसलिए भारत के लिए BRICS का भविष्य शायद एक साझा मुद्रा में नहीं, बल्कि साझा भुगतान व्यवस्था में है।
कल्पना कीजिए—भारत रूस से रुपये में व्यापार कर सके, खाड़ी देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन हो, चीन के साथ सीधे रुपये-युआन settlement की व्यवस्था बने और इसके लिए किसी तीसरी मुद्रा के रूप में हर बार डॉलर की आवश्यकता न पड़े।
यह व्यवस्था डॉलर को एक झटके में समाप्त नहीं करेगी, लेकिन उसकी अनिवार्यता जरूर कम कर सकती है।
नई मुद्रा, लेकिन पुरानी समस्या?
BRICS की संभावित मुद्रा को लेकर एक और सवाल महत्वपूर्ण है।
अगर वह भी fiat currency होगी, यानी जिसका मूल्य किसी निश्चित सोने या वास्तविक संपत्ति से सीधे नहीं बंधा होगा, तो केवल नया नाम देने से मौजूदा व्यवस्था नहीं बदलेगी।
नया नोट, नया डिजिटल टोकन या नया payment system—अगर उसके पीछे वही भरोसे और संस्थागत स्थिरता की समस्या है, तो वह डॉलर का वास्तविक विकल्प नहीं बन सकता।
डॉलर की ताकत केवल अमेरिकी मुद्रा छापने की क्षमता में नहीं है। उसकी ताकत अमेरिकी Treasury market, वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था, वित्तीय बाजारों, व्यापारिक अनुबंधों और दुनिया भर में डॉलर में रखी जाने वाली संपत्तियों के विशाल नेटवर्क में है।
इसलिए BRICS को यदि डॉलर को वास्तविक चुनौती देनी है तो उसे केवल currency नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक financial ecosystem बनाना होगा।
चीन के लिए अवसर, भारत के लिए सावधानी
BRICS का विस्तार चीन के लिए निश्चित रूप से एक बड़ा रणनीतिक अवसर है। चीन दुनिया की सबसे बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसके पास विशाल व्यापारिक नेटवर्क है। यदि BRICS की कोई साझा वित्तीय व्यवस्था बनती है तो चीन उसका सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी बनने की कोशिश करेगा।
लेकिन भारत के लिए चीन का आर्थिक प्रभाव जितना अवसर है, उतनी ही सावधानी का विषय भी है।
भारत को BRICS को “anti-America” मंच बनाने के बजाय “multi-polar economic platform” बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
भारत का हित डॉलर को हटाने में नहीं, बल्कि ऐसी दुनिया बनाने में है जिसमें किसी एक मुद्रा की अनिवार्यता न हो।
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
भारत को न Washington की मौद्रिक निर्भरता चाहिए और न Beijing की।
BRICS की असली सफलता क्या होगी?
आने वाले वर्षों में BRICS की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसने अपनी मुद्रा जारी की या नहीं।
सफलता का वास्तविक पैमाना यह होगा कि—
क्या BRICS देशों के बीच व्यापार स्थानीय मुद्राओं में बढ़ता है?
क्या भुगतान के लिए डॉलर पर निर्भरता कम होती है?
क्या एक सुरक्षित और पारदर्शी cross-border payment network तैयार होता है?
क्या भारत का रुपया अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी भूमिका बढ़ा पाता है?
अगर इन सवालों का जवाब हां है, तो BRICS ने डॉलर को चुनौती देना शुरू कर दिया है—बिना कोई BRICS नोट छापे भी।
भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर
भारत को इस बदलती आर्थिक व्यवस्था में केवल चीन के साथ खड़े होने या अमेरिका से दूरी बनाने की राजनीति नहीं करनी चाहिए।
भारत को अपनी अलग आर्थिक शक्ति बनानी होगी।
रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण, भारतीय वित्तीय बाजारों की गहराई, डिजिटल भुगतान की क्षमता, UPI जैसी प्रणालियों का वैश्वीकरण और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार—ये भारत की वास्तविक ताकत बन सकते हैं।
BRICS भारत के लिए तभी सफल होगा जब वह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करे।
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि—
“क्या BRICS डॉलर को हरा सकता है?”
असली सवाल यह है—
“क्या भारत ऐसी बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था बना सकता है जिसमें डॉलर भी रहे, युआन भी रहे, रुपया भी मजबूत हो—लेकिन किसी एक शक्ति के हाथ में पूरी दुनिया की आर्थिक चाबी न हो?”
यही भारत की वास्तविक चुनौती है।
और शायद यही BRICS का भविष्य भी।
